ऊर्जा के स्रोत ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न ) Urja ke srot question answer class 10th science for Matric exam 2022

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ऊर्जा के स्रोत : Urja ke strot subjective question class 10th science physics Bihar board Matric exam 2022 ( urja ke strot objective question ) ऊर्जा के स्रोत ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )  class 10th science objective question क्लास 10th विज्ञान ऊर्जा के स्रोत क्वेश्चन आंसर लघु उत्तरीय प्रश्न तथा दीर्घ उत्तरीय प्रश्न मैट्रिक परीक्षा 2022. 


1. ऊर्जा संकट क्या है ? इसके समाधान का उल्लेख करें –

उत्तर ⇒औद्योगिकीकरण एवं आधुनिकीकरण ने ऊर्जा की माँग को बढ़ा दी है। ऊर्जा की बढ़ती हुई माँग के कारण जो पर्यावरणीय परिणाम सामने आए हैं।

वे इस प्रकार हैं –
(i)ऊर्जा की बढ़ती माँग ऊर्जा के स्रोतों को नष्ट करने में सहायक हो रही है, फलस्वरूप पर्यावरणीय संतुलन को बाधित कर रहा है।

(ii) ऊर्जा की बढ़ती माँग के कारण ऊर्जा के कन्वेंशनल का काफी उपयोग हो रहा है। जबकि ये स्रोत प्रकृति में सीमित हैं। इसलिए ऊर्जा संकटकी समस्या उत्पन्न हो सकती है।

ऊर्जा के खपत को कम करने के उपाय :

(i) जीवाश्मी ईंधन का उपयोग सावधानीपूर्वक करना चाहिए।
(ii) ईंधन बचाने के लिए खाना बनाने में प्रेशर कुकर का व्यवहार करना चाहिए।
(iii) ऊर्जा की क्षमता को कायम रखने के लिए ऊर्जा स्रोतों का रख-रखाव में सावधानी बरतनी चाहिए।
(iv) ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों जैसे—सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल विद्युत ऊर्जा इत्यादि का उपयोग किया जाना चाहिए, क्योंकि ये ऊर्जाएँ नवीकरणीय हैं।


2. नाभिकीय संलयन क्या है ? इससे उत्पन्न ऊर्जा की विवेचना करें।

उत्तर ⇒आजकल के सभी व्यापारिक नाभिकीय रिएक्टर नाभिकीय विखंडन पर आधारित हैं। परंतु एक अन्य अपेक्षाकृत सुरक्षित प्रक्रिया जिसे नाभिकीय संलयन कहते हैं, द्वारा भी नाभिकीय ऊर्जा उत्पन्न करने की संभावना व्यक्त की जा रही है। संलयन का अर्थ है दो हल्के नाभिकों को जोड़कर एक भारी नाभिक बनाना जिससे सामान्यतः हाइड्रोजन अथवा हाइड्रोजन समस्थानिकों से हीलियम उत्पन्न की जाती है।

2H + 2H →  3He(+n)

इसमें भी आइंस्टीन समीकरण के अनुसार विशाल परिणाम की ऊर्जा निकलती है। ऊर्जा निकलने का कारण यह है कि अभिक्रिया में उत्पन्न उत्पाद का द्रव्यमान, अभिक्रिया में भाग लेनेवाले मूल नाभिकों के व्यक्तिगत द्रव्यमानों के योग से कुछ कम होता है।

इस प्रकार की नाभिकीय संलयन अभिक्रियाएँ सूर्य तथा अन्य तारों की विशाल ऊर्जा के स्रोत हैं। नाभिकीय संलयन अभिक्रियओं में नाभिकों को परस्पर संलयित होने को बाध्य करने के लिए अत्यधिक ऊजो चाहिए। नाभिकीय संलयन प्रक्रिया के होने के लिए आवश्यक शर्ते चरम कोटि की हैं—मिलियन कोटि केल्विन ताप तथा मिलियन कोटि पास्कल दाब।

हाइड्रोजन बम “ताप नाभिकीय अभिक्रिया” पर आधारित होता है। हाइड्रोजन बम के क्रोड में यूरेनियम अथवा प्लूटोनियम के विखंडन पर आधारित किसी नाभिकीय बम को रख देते हैं। यह नाभिकीय बम ऐसे पदार्थं में अन्तःस्थापित किया जाता है जिनमें ड्यूटीरियम तथा लिथियम होते हैं। जब इस नाभिकीय बम (जो विखंडन पर आधारित है) को अधिविस्फोटित करते हैं तो इस पदार्थ का ताप कुछ ही माइक्रोसेकेण्ड में 10 K तक बढ़ जाता है। यह अति उच्च ताप हल्के नाभिकों को संलयित होने के लिए पर्याप्त ऊर्जा उत्पन्न कर देता है जिसके फलस्वरूप अति विशाल परिमाण की ऊर्जा मुक्त होती है।


3. ऊर्जा स्रोत के रूप में जीवाश्म ईंधन तथा सूर्य की तुलना कीजिए एवं उनमें अंतर लिखिए।

उत्तर ⇒

जीवाश्म ईंधन  सूर्य
1. जीवाश्मी ईंधन सीमित है। 1. सूर्य से मिलनेवाली ऊर्जा असीमित है।
2. इसके जलने पर वायु प्रदूषित
जाती है।
2. यह प्रदूषणमुक्त है।
3. किसी भी समय इसका उपयोग
किया जा सकता है।
3. केवल बादलरहित दिन में ही इसका उपयोग संभव है।

4. भूतापीय ऊर्जा क्या है ?

उत्तर ⇒ भौमिकीय परिवर्तनों के कारण भूपर्पटी में गहराइयों पर तप्त शो पिघली चट्टानें ऊपर की ओर ढकेल दी जाती है जो कुछ क्षेत्रों में एकत्र हो । है। इन क्षेत्रों को तप्त स्थल कहते हैं। जब भूमिगत जल इन तप्त स्थलों के में आता है तो भाप उत्पन्न होता है। कभी-कभी यह भाप चट्टानों के बीच में फंस जाती है जहाँ इनका दाब अत्यधिक हो जाता है। तप्त स्थलों तक पाइप डालकर इस दाब वाले भाप को निकालकर विद्युत जनित्र के टरबाइन पर डाला जाता है जिससे टरबाइन में घूर्णन गति उत्पन्न होती है और विद्युत उत्पन्न होता है। यह तप्त भाप, भूतापीय ऊर्जा का स्रोत बन जाता है। इसे ही भूतापीय ऊर्जा कहते हैं।


5. नवीकरणीय एवं अनवीकरणीय ऊर्जा स्रोत में क्या अंतर है ?

उत्तर ⇒
(i) नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत से बार-बार ऊर्जा की प्राप्ति होती है, लेकिन अनवीकरणीय ऊर्जा स्रोत से एक ही बार ऊर्जा की प्राप्ति हो पाती है।
(ii)नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत के अन्तर्गत सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा आदि हैं, जबकि अनवीकरणीय ऊर्जा स्रोत के अन्तर्गत कोयला, पेट्रोलियमऔर प्राकृतिक गैस हैं।

(iii) नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत प्रदूषणमुक्त है जबकि अनवीकरणीय ऊर्जा स्रोत प्रदूषणयुक्त है।


6. सौर-कुकर के उपयोग करने के क्या-क्या लाभ तथा हानियाँ हैं ? क्या ऐसे भी क्षेत्र हैं जहाँ सौर-कुकरों की सीमित उपयोगिता है ?

उत्तर ⇒सौर-कुकर के उपयोग करने के लाभ :

(i) यह प्रदूषण उत्पन्न नहीं करता है, लेकिन हमारे भोजन को पकाता है।
(ii) इसके लिए हमें कुछ भुगतान नहीं करना पड़ता है।
(iii) इसका उपयोग सरल है।
(iv) सौर-कुकर द्वारा बनाए गए भोजन में पौष्टिक तत्त्व का क्षय नहीं होता है।

सौर कुकर के उपयोग करने पर हानियाँ :

(i) खाना बनाने में ज्यादा समय लगता है।
(ii) बादल युक्त दिन में सौर-कुकर से खाना बनाने में अत्यंत कठिनाई होती है।
(iii) चपाती या भुना जाने वाला भोजन सौर-कुकर द्वारा नहीं बनाया जा सकता
(iv) हमेशा सौर-कुकर को सूर्य की दिशा में करना पड़ता है। कुछ ऐसे भी क्षेत्र है जहाँ सौर-कुकर का उपयोग सीमित है। ध्रुव पर छः महीने तक सूर्योदय नहीं होता है। इसके अतिरिक्त पहाड़ी क्षेत्र में सूर्य की किरणें कुछ ही समय तक देखी जाती हैं। अतः ऐसे क्षेत्रों में सौर-कुकर का उपयोग कठिन है।


7. जैव मात्रा तथा ऊर्जा स्रोत के रूप में जल विद्युत की तुलना कीजिए एवं उनमें अंतर लिखिए।
उत्तर ⇒

जैव मात्रा  जल विद्युत
 1. बायोमास से ऊर्जा प्राप्त करने के लिए गोबर
गैस संयंत्र का उपयोग किया जाता है।
 1. जल विद्युत प्राप्त करने के लिए नदियों पर बड़े-बड़े बाँधों का उपयोग है ।
 2. बायोमास के जलने से वातावरण
प्रदूषित हो जाता है।
 2. जल विद्युत से वातावरण प्रदूषित नहीं होता है।
 3.बायोमास में रासायनिक ऊर्जा होती है।  3. जल विद्युत ऊर्जा में गतिज ऊर्जा होती है।

8. ऐसे दो ऊर्जा स्रोतों के नाम लिखिए जिन्हें आप नवीकरणीय मानते हैं। अपने चयन के लिए तर्क दीजिए।

उत्तर ⇒दो नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत–जल ऊर्जा और पवन ऊर्जा हैं।

(i) जल ऊर्जा – यह ऊर्जा बहते जल द्वारा प्राप्त गतिज ऊर्जा होती है अथवा ऊँचाई पर स्थित जल की स्थितिज ऊर्जा होती है। किसी ऊँचाई से गिरते हुए जल का रूपान्तरण विद्युत ऊर्जा में होता है। यह क्रिया लगातार होती रहती है और विद्युत ऊर्जा प्राप्त होती है।

(ii) पवन ऊर्जा- यह ऊर्जा वैसे स्थानों पर प्राप्त की जाती है जहाँ वर्ष के अधिकांश दिनों में तीव्र पवन चलती है। इसके लिए पवन चक्की का उपयोग किया जाता है। इस पर बार-बार धन खर्च करने की जरूरत नहीं पड़ती है। पवन चक्की की घूर्णी गति का उपयोग विद्युत जनित्र के टरबाइन को घुमाने में होता है और विद्युत ऊर्जा प्राप्त होती है।


9. स्पष्ट करें कि पवन ऊर्जा से विद्युत ऊर्जा किस प्रकार उत्पन्न किया जाता है ?

उत्तर ⇒पवन चक्की के उपयोग से पवन ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तन किया जाता है। फिर इस यांत्रिक की सहायता से विद्युत जनित्र के टरबाइन को घुमाया जाता है। पवन चक्की में दृढ़ आधार पर किसी ऊँचे स्थान पर बहुत बडा पंखा लगा होता है। यह पवन चक्की वैसे स्थानों पर लगाया जाता है जहाँ हमेशाऔसत गति का वायु मिलता रहे। चक्की में लगे पंखुड़ी पर हवा के निम्न दाब के कारण इसमें घूर्णन गति उत्पन्न होती है। ब्लेड के घूर्णन गति के कारण पवन चक्की का उपयोग विद्युत जनित्र के आर्मेचर को घुमाने में किया जाता है। एक पवन चक्की से उत्पन्न विद्युत का परिमाण बहुत कम होता है। ऊर्जा फार्म में अनेकों पवन चक्की का उपयोग कर अधिक मात्रा में विद्युत ऊर्जा प्राप्त किया जाता है।


10. पवन ऊर्जा के उपयोग में कौन-कौन कठिनाइयाँ हैं ? लिखें।

उत्तर ⇒(i) पवन ऊर्जा फार्म सिर्फ उन्हीं क्षेत्रों में बनाये जा सकते हैं जहाँ वर्ष के अधिकांश समय में तेज हवा बहती हो। टरबाइन की आवश्यक चाल को बनाये रखने के लिए पवन की चाल 15 किमी०/घंटा से अधिक होनी चाहिए।

(ii) पवन ऊर्जा फार्म में संचायक सेलों जैसी कोई पूर्तिकर (compensatory) सुविधा भी होनी चाहिए जिसका उपयोग ऊर्जा की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उस समय किया जा सके, जब पवन नहीं चलता हो।

(iii) पवन ऊर्जा फार्म के लिए विशाल भूखंड की जरूरत पड़ती है। 1MW के जनित्र के लिए कम-से-कम 2 हेक्टेयर भूमि चाहिए।

(iv) पवन ऊर्जा फार्म स्थापित करने की आरंभिक लागत अधिक होती है।

(v) पवन चक्कियों के दृढ़ आधार तथा पंखें खुले में होने के कारण आँधी, चक्रवात, धप,वर्षा आदि प्राकतिक आपदाओं को सहन करते हैं। अतः इसके लिए उच्च रख-रखाव की जरूरत होती है।


11. ऊर्जा के बढ़ती माँग के पर्यावरणीय परिणाम क्या हैं ? ऊर्जा की खपत को कम करने के उपाय लिखिए।

उत्तर ⇒औद्योगिकीकरण एवं आधनिकीकरण ने ऊर्जा की माँग को बढ़ा दी है। ऊर्जा की बढ़ती हुई माँग के कारण जो पर्यावरणीय परिणाम सामने आए हैं। वे इस प्रकार हैं –
(i)ऊर्जा की बढ़ती माँग ऊर्जा के स्रोतों को नष्ट करने में सहायक हो रही है, फलस्वरूप पर्यावरणीय संतुलन को बाधित कर रहा है।

(ii) ऊर्जा के बढ़ती माँग के कारण ऊर्जा के कन्वेंशनल का काफी उपयोग हो रहा है, जबकि ये स्त्रोत प्रकृति में सीमित हैं। इसलिए ऊर्जा संकट कीसमस्या उत्पन्न हो सकती है।

ऊर्जा के खपत को कम करने के उपाय :

(i) जीवाश्मी ईंधन का उपयोग सावधानीपूर्वक करना चाहिए।
(ii) ईंधन बचाने के लिए खाना बनाने के लिए प्रेशर कुकर का व्यवहार करना चाहिए।
(iii) ऊर्जा की क्षमता को कायम रखने के लिए ऊर्जा स्रोतों का रख-रखाव में सावधानी बरतनी चाहिए।
(iv) ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों जैसे—सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल विद्युत ऊर्जा इत्यादि का उपयोग किया जाना चाहिए, क्योंकि ये ऊर्जाएँ नवीकरणीय हैं


12. जैव गैस (बायोगैस) प्राप्त करने के विभिन्न चरणों का वर्णन कीजिये। स्पष्ट कीजिये कि अवायुजीवी अपघटन से क्या तात्पर्य है ?

उत्तर ⇒ जैव गैस प्राप्त करने के भिन्न-भिन्न चरण निम्नांकित हैं –

(i) पानी और जानवरों के गोबर को बराबर मात्रा में मिलाकर मिश्रण बनाया जाता है।

(ii) मिश्रण को संपाचक (डाइजेस्टर) टैंक में रखा जाता है।

(iii) आंशिक रूप से टैंक को भर दिया जाता है और इसके ऊपरी मुँह का बन्द कर दो माह के लिए छोड़ दिया जाता है।

(iv) डाइजेस्टर में सूक्ष्म जीवों की क्रिया से जैव-मात्रा के जटिल यौगिकों का अपघटन होता है।

(v) पानी की उपस्थिति में अवायुजीवी सूक्ष्म जीव डाइजेस्टर में उपस्थित जैव-मात्रा का निम्नीकरण कर देते हैं। डाइजेस्टर में जैव गैस उत्पन्न होत हैं और यह गाढ़ा घोल (स्लरी) को नीचे दबाव से ठेल देते हैं और गैस ऊपर आ जाता है।

(vi) पाइप द्वारा गैस को उपभोक्ता के पास भेज दी जाती है।

(vii) बायोगैस लगातार प्राप्त हो, तो डाइजेस्टर में गाढ़ा घोल (स्लरी) समय-समय पर डाला जाता है।


13. महासागरों से प्राप्त हो सकने वाली ऊर्जाओं की क्या सीमाएँ है ?

उत्तर ⇒ महासागरों से प्राप्त होने वाली ऊर्जाएँ निम्नांकित हैं –

(i) ज्वारीय ऊर्जा – ज्वारीय ऊर्जा प्राप्त करने के लिए बहुत ही कम ऐसे स्थान हैं, जहाँ बाँध बनाकर ऐसी सीमित ऊर्जा की प्राप्ति की जा सकती है।

(ii) तरंग ऊर्जा – तरंग ऊर्जा का उपयोग तभी संभव है जहाँ तरंगें अत्यंत प्रबल है। तरंग ऊर्जा को ट्रेप करने के लिए बहुत सी युक्तियाँ विकसित की गई हैं ताकि टरबाइन को घुमाकर विद्युत ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए इनका सही उपयोग किया जा सके।
वर्तमान में हमारे पास उपलब्ध तकनीक काफी महंगा है। अत: तरंग ऊर्जा को सलभता से प्राप्त करना कठिन है।

(iii) महासागरीय तापीय ऊर्जा महासागरों के पृष्ठ सौर ऊर्जा से गर्म हो . जाते हैं, लेकिन इनके गहराई वाले भाग का ताप कम रहता है। ताप में इस अंतर का उपयोग सागरीय तापीय ऊर्जा रूपान्तरण विद्युत संयंत्र में ऊर्जा प्राप्त करने के लिए किया जाता है । OTEC विद्युत संयंत्र तभी प्रचलित होते हैं जब महासागरीय के पृष्ठ और 2 km गहराई तक के जल के ताप में 20° C का अंतर होता है।
महासागरों की ऊर्जा क्षमता असीमित है, लेकिन दक्षता पूर्ण व्यापारिक दोहन में कठिनाई है।


14. निम्नलिखित से ऊर्जा निष्कासित करने की सीमाएँ लिखें।
(a) पवनें (b) तरंगें (c) ज्वारभाटा

उत्तर ⇒

(a).  पवनों से निष्कासित होने वाली ऊर्जाओं की सीमाएँ : –
(i) हरेक जगह हर क्षण बहता पवन उपलब्ध नहीं होता है।
(ii) पवनों से ऊर्जा प्राप्त करने के लिए पवन को 15 km/h के वेग से अधिक होना चाहिए।

(b) तरंगों से उत्पादित ऊर्जा की सीमाएँ :-
(i) हरेक समय तरंग की उपलब्धता नहीं रहती है।
(ii) यह अत्यधिक खर्चीला है।

(c) ज्वार-भाटा से उत्पन्न ऊर्जा की सीमाएँ :-
(i) ज्वारीय ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए सागरों में बड़े बाँध की जरूरत होती है। ऐसे स्थान सीमित हैं।
(ii) ज्वारीय ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए बाँध बनाना काफी महँगा है।


15. रॉकेट ईंधन के रूप में हाइड्रोजन का उपयोग किया जाता रहा है ? क्या आप इसे CNG की तुलना में अधिक स्वच्छ ईंधन मानते हैं ? क्यों अथवा क्यों नहीं ?

उत्तर ⇒CNG की तुलना में हाइड्रोजन को स्वच्छ ईंधन माना जाता है। इसके कारण निम्न हैं –

(i) हाइड्रोजन का ऊष्मीय मान CNG से अधिक है।
(ii) CNG ऊर्जा का परंपरागत स्रोत है, लेकिन हाइड्रोजन नहीं है।
(iii) CNG ग्रीन हाउस गैस है जबकि हाइड्रोजन नहीं है।
(iv) CNG के जलने पर Co और C0, गैसें निकलती हैं जबकि Hके जलने पर हानिकारक गैसें नहीं निकलती हैं।


16. चित्र की सहायता से बॉक्सनुमा सौर-कुकर की संरचना व कार्य विधि का वर्णन कीजिये।

उत्तर ⇒बनावट:
(i) सौर-कुकर लकड़ी के बक्से B का बना होता है जिसे बाहरी बक्सा कहते हैं। लकड़ी के इस बक्से के अंदर लोहे या ऐल्युमीनियम की चादर सेबना एक और बक्सा होता है जिसे भीतरी बक्सा कहते हैं। भीतरी बक्से के अंदर की दीवारों तथा तली पर काला रंग कर दिया जाता है।

(ii) सौर-कुकर के बक्से के ऊपर मोटे काँच का एक ढक्कन ‘G’ होता है, जो लकड़ी के फ्रेम में फिट होता है।

(iii) सौर-कुकर के बक्से में समतल दर्पण से बना एक परावर्तक ‘R’ होता है।

कार्यविधि :-
(i) पकाये जाने वाले भोजन को ऐल्युमीनियम या स्टील के बरतन ‘C’ में डालकर सौर-कुकर के अंदर रख दिया जाता है तथा ऊपर से शीशे के ढक्कन से बंद कर दिया जाता है।

(ii) भोजन पकाने के लिए सौर-कुकर को धूप में रख देते हैं।

(iii) जब सूर्य प्रकाश की अवरक्त किरणें एक बार कुकर के बक्से में प्रवेश कर जाती हैं तो काँच का ढक्कन उन्हें वापस बाहर नहीं जाने देता।

(iv) लगभग 2-3 घंटे की अवधि में सौर-कुकर का ताप 100° C से 140°C तक पहुँच जाता है। यह ऊष्मा सौर-कुकर के अंदर बरतनों में रखे भोजन को पका देती है।

सूर्य की किरने


17. ताप विद्युत उत्पादन की प्रक्रिया को निदर्शित करने के लिए एक मॉडल प्रस्तुत करें: चित्र नामांकित रहना चाहिए।

उत्तर ⇒
भपनाली


18. जल विद्युत संयंत्र का सचित्र वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒बहते जल की गतिज ऊर्जा से उत्पन्न विद्युत जल विद्युत कहलाता है तथा वह संयंत्र जो बड़े पैमाने पर बहते जल से विद्युत उत्पन्न करता है, जल विद्युत संयंत्र कहलाता है। बहता जल ऊर्जा का एक प्रमुख स्रोत है। जल विद्युत उत्पन्न करने के लिए नदियों के बहाव को रोककर बड़े जलाशयों (कृत्रिम झील) में जल एकत्र करने के लिए ऊँचे-ऊँचे बाँध (dam) बनाए जाते हैं। जलाशयों में जल संचित होता है जिसके फलस्वरूप जल का तल ऊँचा हो जाता है। बाँध के ऊपरी भाग से पाइपों द्वारा जल बाँध के आधार के समीप स्थापित टरबाइन के ब्लेडों पर मुक्त रूप से गिरता है जिससे टरबाइन का ब्लेड घूमने लगता है, टरबाइन की धूरी (axle) जनित्र (generator) के आर्मेचर से जुड़ा रहता है। अतः लगातार आर्मेचर के घूमने से यांत्रिक ऊर्जा विद्युत ऊर्जा में बदल जाती है।लोहे का दरबाजा


जल विद्यत की उत्पत्ति का सिद्धान्त :
(i) जैसे ही बहता जल नीचे से ऊँचे बाँध पर बने संग्राहक में पहुँचता है तो उसकी गतिज ऊर्जा स्थितिज ऊर्जा में बदल जाती है।
(ii) जब जल ऊपर से नीचे टरबाइन के ब्लेड पर गिरता है तो स्थितिज ऊर्जा गतिज ऊर्जा में बदल जाती है।
(iii) जल टरबाइन के ब्लेड पर गिरता है तो वह तेजी से घूमने लगता है और गतिज ऊर्जा टरबाइन के द्वारा यांत्रिक ऊर्जा में बदल जाती है।

(iv) अन्ततः यांत्रिक ऊर्जा विद्युत ऊर्जा में बदल जाता है, जिसे जल विद्युत ऊर्जा कहा जाता है।

जल विद्युत ऊर्जा से लाभ :
(a) जल मुफ्त में मिल जाता है ।
(b) यह ऊर्जा प्रदूषण मुक्त है एवं
(C) यह सस्ता प्राप्त होता है।


19. उत्तम ईंधन किसे कहते हैं ?

उत्तर ⇒उत्तम ईंधन वह ईंधन है जिसमें निम्न विशेषताएँ होती हैं-

(i) ईंधन का ऊष्मीय मान (या कैलोरी मान) उच्च होना चाहिए ताकि वह प्रति इकाई भार के हिसाब से अधिक ऊष्मा दे सके।

(ii) ईंधन का प्रज्वलन ताप उचित होना चाहिए ताकि उसे आसानी से जलाया जा सके। ईंधन का प्रज्वलन ताप न तो बहुत कम और न ही बहुतअधिक होना चाहिए।

(iii) ईंधन में अज्वलनशील पदार्थों की मात्रा कम होनी चाहिए ताकि वह जलने पर अधिक राख पीछे न छोड़े।

(iv) ईंधन के जलने से कोई हानिकारक तथा विषैली गैसें उत्पन्न नहीं होनी चाहिये जो वायु को प्रदूषित कर सकें।

(v) चुना गया ईंधन अन्य प्रयोजनों के लिए अधिक उपयोग नहीं होना चाहिए।

(vi) ईंधन सस्ता होना चाहिए और आसानी से उपलब्ध होना चाहिए।

(vii) ईंधन मध्यम दर से तथा शांतमय ढंग से जलना चाहिए।

(viii) ईंधन को इस्तेमाल करना आसान होना चाहिए, ईंधन को लाना-ले-जाना (परिवहन) सुरक्षित तथा आसान होना चाहिए तथा उसका भंडारण सुविधायुक्त होना चाहिए।


20. नाभिकीय रिएक्टरों से विद्युत ऊर्जा कैसे प्राप्त की जाती है ?

उत्तर ⇒नाभिकीय शिण्वटर में यरेनियम को ईंधन के रूप में प्रयक्त किया जाता है। पहले U-235 की विखंडन योग्य प्रतिशत मात्रा बढ़ाने के लिए इसे संवर्धित किया जाता है । जब एक मंद गति वाला न्यूट्रॉन U-235 के नाभिक से टकराता है तो तीन नये न्यूट्रॉन मुक्त होते हैं जो एक शृंखला बनाते हैं। इन मुक्त न्यूट्रॉनों को नियंत्रण में रखने के लिए कैडमियम तथा बोरॉन धातु की छड़ें प्रयोग में लाते हैं। वे छड़ें न्यूट्रॉनों को अवशोषित करके उन्हें प्रभावित बना देती है । जब ये छड़ें पूर्णत: ईंधन में प्रविष्ट कर दी जाती हैं तो वे समस्त न्यूट्रॉनों का अवशोषण कर लेती हैं तथा शृंखला अभिक्रिया रूक जाती है।
इन छडों को बाद में ईंधन में से धीरे-धीरे उतना ही बाहर निकाला जाता है जितना कि वह केवल उतनी ऊर्जा का अवशोषण करे जिससे मुक्त न्यूट्रॉनों द्वारा नाभिकीय विखंडन अभिक्रिया को नियंत्रित रूप में संचालित करके निश्चित परिणाम में ऊर्जा प्राप्त होती रहे । इस प्रकार प्राप्त ऊष्मीय ऊर्जा से पानी को भाप में बदलकर बड़े-बड़े टरबाइन घुमाए जाते हैं। भाप की ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है। हर टरबाइनों के घूमने से विद्युत जनित्र द्वारा विद्युत उत्पन्न होती है । जब भाप संघनित हो जाती है तो इसे फिर दूसरे चक्र में काम में लाया जाता है।


21. पवन चक्की के कार्य करने के सिद्धांत को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर ⇒गतिशील हवा को पवन कहते हैं। इसके पास पर्याप्त मात्रा में गतिज ऊर्जा होती है क्योंकि यह गतिशील है, अतः इसमें कार्य करने की क्षमता होती है। जब हवा तेजी से चलती है तो अपनी गति से वह राह में आने वाली वस्तुओं की दिशापवन चक्की बदल सकती है, उन्हें स्थिर अवस्था में गतिशील बना सकती है; घूमने वाली वस्तुओं को तेजी से घुमा सकती है । तूफानों में बड़े-बड़े पेड़ इसी के कारण उखड़ जाते हैं।, खंबे गिर जाते हैं। और हल्की वस्तुएँ उड़कर दूर जा गिरती है।
पवन-चक्की एक मशीन है जो तेज हवा चलने से उत्पन्न ऊर्जा पर आधारित है। इसमें बड़े-बड़े पंख होते हैं जो पवन की गतिज ऊर्जा से घूमने लगते हैं और वे अपने साथ जुड़े अन्य उपकरणों को घुमाकर उपयोगी कार्य कराते हैं। पवन चक्की को गति देने और उससे उपयोगी कार्य कराने के लिए पवन का वेग कम-से-कम 15 किमी०/घंटा होना चाहिए।


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