4. हमारी वित्तीय संस्थाएँ ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )

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1. गैर-सरकारी संस्थाएँ किस प्रकार सेवा क्षेत्र के विकास को सहयोग करती है, उदाहरण के साथ लिखें।

उत्तर-वित्तीय संस्थाओं में ऐसी सभी संस्थाओं को शामिल किया जाता है जो जरूरतमंद लोगों को ऋण-देने का कार्य करती हैं। गैर संस्थागत वित्तीय संस्थाएँ इसमें हम साहूकार, महाजन आदि को शामिल करते हैं लेकिन इन पर सरकार व रिजर्व बैंक का नियंत्रण नहीं होता है। वर्तमान समय में बिहार में गैर संस्थागत वित्तीय संस्थाएँ भी अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही है, क्योंकि अशिक्षा व गरीबी के कारण गाँव में रहने वाले किसान अपनी जरूरतों के लिए आज भी ऋण इन्हीं साहूकार व महाजनों से ले रहे हैं। इनसे ऋण उन्हें शीघ्र व आसानी से प्राप्त हो जाता है। साथ ही उन्हें कोई कागजी कार्यवाही नहीं करनी पड़ती है। .


2. राष्ट्रीय वित्तीय संस्थान किसे कहते हैं? इसे कितने भागों में बाँटा जाता है ? वर्णन करें।

उत्तर-राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएँ वे हैं जो राष्ट्रीय स्तर पर वित्त प्रबंधन तथा साख अथवा ऋण के लेन-देन का कार्य करती हैं। इन वित्तीय संस्थाओं को प्रायः दो वर्गों में विभाजित किया जाता है- मुद्रा बाजार की वित्तीय संस्थाएँ तथा पूँजी बाजार की वित्तीय संस्थाएँ। मुद्रा बाजार की वित्तीय संस्थाएँ साख या ऋण का अल्पकालीन लेन-देन करती है। इसके विपरीत, पूँजी बाजार की संस्थाएँ उद्योग तथा व्यापार की दीर्घकालीन साख की आवश्यकताओं को पूरा करती है। मुद्रा बाजार की वित्तीय संस्थाओं में बैंकिंग संस्थाएं सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं। भारतीय बैंकिंग प्रणाली के शीर्ष पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया है जिसकी स्थापना 1935 में हुई थी। यह भारत का केंद्रीय बैंक है जो देश की संपूर्ण बैंकिंग व्यवस्था का नियमन एवं नियंत्रण करता है। भारत की बैंकिंग प्रणाली व्यावसायिक बैंकों पर आधारित है।


3. राज्यस्तरीय संस्थागत वित्तीय स्रोत के कार्यों का वर्णन करें।

उत्तर- राज्यस्तरीय संस्थागत वित्तीय संस्थान के अंतर्गत वैसे संस्थान आते हैं जो राज्य स्तर पर विकासात्मक कार्य करते हों। ये ऋण उपलब्ध कराकर राज्य में साख का नियंत्रण करते हैं। कुछ प्रमुख राज्यस्तरीय संस्थागत वित्तीय संस्थानों के कार्य निम्नलिखित हैं

(i) सहकारी बैंक – सहकारी बैंकों की स्थापना अलग-अलग राज्यों द्वारा बनाई गई सहकारी समितियों के अधिनियमों द्वारा की गई है। भारत में सहकारी बैंक भी बैंकिंग के आधारभूत कार्य को पूरा करते हैं। वस्तुतः भारत में सहकारी बैंकों का गठन तीन स्तरों वाला है। राज्य सहकारी बैंक संबंधित राज्य में शीर्ष संस्था होती है। इसके बाद जिला सहकारी बैंक जिला स्तर पर कार्य करती है। तीसरा स्तर प्राथमिक ऋण समितियों का होता है, जो ग्रामीण स्तर पर कार्य करते हैं।

(ii) केंद्रीय सहकारी बैंक- इस संस्था का कार्य एक जिले तक ही सीमित रहता है। सहकारी बैंकों की सदस्यता सिर्फ सहकारी समितियों को ही प्राप्त होती है। भारत के समस्त राज्यों में इस प्रकार की संस्था है। यह बैंक सहकारी साख समितियों को आवश्यकतानुसार ऋण प्रदान करते हैं जिससे कि ये समितियाँ कृषकों तथा अन्य सदस्यों को समुचित आर्थिक सहायता उपलब्ध करा सके।

(iii) क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक- इस बैंक की स्थापना विशेषकर दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों में उन लोगों को बैंकिंग सुविधाएँ पहुँचाने के उद्देश्य से की गई है जहाँ पर बैंकिंग सुविधा उपलब्ध नहीं है। इन बैंकों का मूल उद्देश्य समाज के उन कमजोर वर्गों के लोगों को रियायती दर पर संस्थागत ऋण उपलब्ध कराना है। इनका एक उद्देश्य ग्रामीण बचत को जटाकर उत्पादक गतिविधियों में लगाना भी है।

(iv) नाबार्ड-  नाबार्ड ग्रामीण क्षण हाँचे में एक शीर्षस्थ संस्था के रूप में अनेक वित्तीय संस्थाओं को पनर्वित सविधा प्रदान करता है, जो प्रामीण क्षेत्रों में उत्पादक गतिविधियों के विस्तत क्षेत्रों को बढ़ावा देने के लिए ऋण देती हैं। यह केन्द्र सरकार द्वारा गारण्टी प्राप्त बॉण्ड तथा ऋण जारी करके भी संसाधन जुटा सकता है। इसके अतिरिक्त यह राष्ट्रीय ग्रामीण साख निधि के संसाधनों का भा प्रयोग करता है।

(v) भूमि विकास बैंक-  किसानों की दीर्घकालीन वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए इसकी स्थापना की गई है। ये बैंक किसानों को भूमि खरीदन, भूमि स्थायी सधार करने अथवा पराने ऋणों का भगतान करने आदि का दीर्घकालीन ऋणों की व्यवस्था करते हैं। भमि विकास बैंक किसानों की अचल सम्पत्ति को बंधक रखकर ऋण प्रदान करते हैं। साधारणतया प्रतिभूति के मूल्य का 50% दिया जाता है।


4. भारत में संस्थागत वित्तीय स्रोत कौन-कौन है ?

उत्तर- राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएँ वे संस्थाएँ हैं जो देश की वित्तीय आर साख नीतियों को निर्देशन एवं निर्धारण करती हैं तथा राष्ट्रीय स्तर पर वित्त उपलब्ध करान का काम करती हैं। राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के दो प्रमुख अंग हैं

(क) भारतीय मुद्रा बाजार
(ख) भारतीय पूँजी बाजार 

(क) भारतीय मुद्रा बाजार – भारतीय मुद्रा बाजार वह बाजार है जिसमें मुद्रा के क्रेता एवं विक्रेता मुद्रा का लेन-देन करते हैं। भारतीय मुद्रा बाजार के दो क्षेत्र हैं। प्रथमतः आधुनिक अथवा संगठित क्षेत्र के शीर्ष पर भारत का रिजर्व बैंक आफ इंडिया इसके अलावा राष्ट्रीयकृत एवं गैर-राष्ट्रीयकृत बैंक आदि हैं। दूसरा क्षेत्र देशी अथवा असंगठित क्षेत्र के अन्तर्गत देशी बैंकर तथा मुद्रा उधार देने वाले विभिन्न व्यक्ति आते हैं। भारत की राष्ट्रीय बैंकिंग प्रणाली में निम्न तीन प्रकार की बैंकिंग व्यवस्था कायम है

(i) केन्द्रीय बैंक,
(ii) वाणिज्यिक बैंक,
(iii) सहकारी बैंक।

(ख). भारतीय पूंजी बाजार- जहाँ कम्पनियों तथा औद्योगिक इकाइयों के लिए दीर्घकालीन वित्तीय व्यवस्था की जाती है, उसे पूँजी बाजार कहा जाता है। इसके दो मुख्य अंग होते हैं, जिसे प्राथमिक बाजार और द्वितीयक बाजार कहा जाता है। . प्राथमिक बाजार के अन्तर्गत कंपनियों के नए हिस्से का निर्गमन होता है, जबकि द्वितीयक बाजार में स्टॉक एक्सचेंज अथवा शेयर बाजार होता है। इस प्रकार भारतीय पूँजी बाजार मूलतः प्रतिभूति बाजार, औद्योगिक बाजार, विकास वित्त संस्थाएँ तथा गैर बैंकिंग वित्त कम्पनियाँ आदि वित्तीय संस्थानों पर आधारित है। वित्तीय संस्थान किसी भी देश का मेरूदंड माना जाता है।


5. बिहार में कार्यरत विभिन्न गैर संस्थागत एवं संस्थागत वित्तीय संस्थाओं की विवेचना कीजिए।

उत्तर-वित्तीय संस्थाओं में ऐसी सभी संस्थाओं को शामिल किया जाता है जो जरूरतमंद लोगों को ऋण देने का कार्य करती हैं। ये संस्थाएँ दो प्रकार की होती हैं।

(i) गैर संस्थागत वित्तीय संस्थाएँ-  इसमें हम साहूकार, महाजन आदि को शामिल करते हैं लेकिन इन पर सरकार व रिजर्व बैंक का नियंत्रण नहीं होता है। गैर संस्थागत वित्तीय संस्थाएँ–वर्तमान समय में बिहार में गैर संस्थागत वित्तीय संस्थाएँ भी अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर. रही हैं, क्योंकि अशिक्षा व गरीबी के कारण गाँव में रहने वाले किसान अपनी जरूरतों के लिए आज भी ऋण इन्हीं साहूकार व महाजनों से ले रहे हैं। इनसे ऋण उन्हें शीघ्र व आसानी से प्राप्त हो जाता है। साथ ही उन्हें कोई कागजी कार्यवाही नहीं करनी पड़ती है।

(ii) संस्थागत वित्तीय संस्थाएँ – इसमें बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, सहकारी बैंक, राज्य वित्तीय निगम आदि को शामिल किया जाता है। इन पर रिजर्व बैंक व सरकार का पूर्ण नियंत्रण होता है। संस्थागत वित्तीय संस्थाएँ-आज बिहार प्रदेश में संस्थागत वित्तीय संस्थाएँ भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही हैं। राष्ट्रीयकृत बैंक अपनी शाखाओं का निरन्तर विस्तार कर रही हैं। अपनी अधिकांश शाखाएँ ग्रामीण क्षेत्रों में खोल रही हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ पर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, सहकारी बैंक तथा सहकारी साख समितियाँ भी किसानों को अल्पकालीन व दीर्घकालीन ऋण प्रदान कर रही हैं। इन्होंने ऋण देने की प्रक्रिया सरल कर कागजी कार्यवाही कम कर दी है।


6. व्यावसायिक बैंक कितने प्रकार की जमा राशि को स्वीकार करते हैं ? संक्षिप्त विवरण करें।

उत्तर- व्यावसायिक बैंक प्रायः चार प्रकार की जमा राशि को स्वीकार करते हैं –

(i) स्थायी जमा- इसे सावधि जमा भी कहा जाता है। इसके अंतर्गत बैंक एक निश्चित अवधि के लिए राशि जमा कर लेता है और उसकी निकासी समय से पर्व नहीं होती।

(ii) चालू जमा- इसमें पैसे को जमा करने वाला इच्छानुसार रुपया जमा करता है और निकाल भी सकता है। इसे माँग जमा भी कहते हैं।

(iii) संचयी जमा-  इसमें ग्राहकों को बैंक द्वारा निकासी के अधिकार को सीगित कर देता हैं। इसमें एक निश्चित रकम से अधिक निकासी नहीं हो सकती है।

(iv) आवर्ती जमा- इस प्रकार के खाते में ग्राहकों को प्रतिमाह एक निश्चित राशि जमा करनी होती है। यह एक निश्चित अवधि तक (60 माह या 72 माह) होती है।


7. रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया के विभिन्न कार्यों की विवेचना कीजिए।

उत्तर-रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं

(i) रिजर्व बैंक को नोट निर्गमन का एकाधिकार प्राप्त है।

(ii) रिजर्व बैंक केन्द्रीय तथा राज्य सरकारों के बैंकिंग सम्बन्धी समस्त कार्य करता है।

(iii) रिजर्व बैंक बैंकों का बैंक है। यह आवश्यकता के समय उनकी सहायता करता है। समय-समय पर उनका उचित मार्गदर्शन करता है। उन पर पूर्ण नियंत्रण रखता है।

(iv) रुपये की विनिमय दर को स्थिर रखना रिजर्व बैंक का एक महत्त्वपूर्ण कार्य है।

(v) रिजर्व बैंक मुद्रा व साख का नियमन एवं नियंत्रण करता है।

(vi) यह देश के अनुसूचित बैंकों को समाशोधन गृह की सुविधाएँ प्रदान करता है।

(vii) यह महत्त्वपूर्ण आर्थिक एवं मौद्रिक आंकड़े एकत्रित कर उन्हें एक वार्षिक रिपोर्ट के रूप में प्रकाशित करता है।


8. सहकारिता के मूल तत्व क्या हैं? बिहार के विकास में इसकी भूमिका का वर्णन करें।

उत्तर-सहकारिता एक ऐच्छिक संगठन है। इसमें व्यक्ति स्वेच्छा से अपनी आर्थिक उन्नति के लिए सम्मिलित होते हैं। सहकारिता के मूल तत्त्व इस प्रकार हैं

(i) सहकारिता एक ऐच्छिक संगठन है।
(ii) इसमें सभी सदस्यों को समान अधिकार प्राप्त होते हैं।
(iii) इसकी स्थापना सामान्य आर्थिक हितों की प्राप्ति के लिए होती है।
(iv) इसका प्रबंध प्रजातांत्रिक सिद्धांतों के आधार पर होता है।

बिहार एक ग्राम प्रधान राज्य है। यहाँ की लगभग 90 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती हैं। इनमें अधिकांश कृषि एवं इससे संबद्ध क्रियाकलापों द्वारा जीविकोपार्जन करते हैं। बिहार के ग्रामीण परिवारों में बहुत छोटे अथवा सीमांत किसानों तथा भूमिहीन श्रमिकों की संख्या सर्वाधिक है। इस प्रकार के सीमित साधनों वाले व्यक्ति सहकारी संस्थाओं के माध्यम से ही अपने आर्थिक हितों में वृद्धि कर सकते हैं। हमारे राज्य के विकास में सहकारिता की भूमिका कई प्रकार से महत्त्वपूर्ण हो सकती है। वर्तमान में सहकारी संस्थाएँ कृषि-ऋण की आवश्यकताओं का एक बहुत छोटा भाग पूरा करती हैं। परिणामतः महाजनों आदि पर छोटे किसानों की निर्भरता बहुत अधिक है। सहकारिता के विस्तार से ग्रामीण क्षेत्रों में महाजनों और साहूकारों का प्रभुत्व कम होगा तथा ब्याज की दरों में गिरावट आएगी। सहकारी संस्थाएँ कृषि-उपज के विक्रय, भूमि की चकबंदी तथा उन्नत खेती की व्यवस्था करने में भी सहायक हो सकती है। . राज्य के विभाजन के पश्चात बिहार के अधिकांश बड़े और मँझोले उद्योग झारखंड में चले गए हैं तथा अब राज्य में छोटे आकारवाले उद्योगों की ही प्रधानता है। लेकिन, पँजी के अभाव में बिहार के अधिकांश कुटीर एवं लघु उद्योग रुग्न हो गए हैं। इनके पुनरुद्धार में भी सहकारी संस्थाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।


9. भारत में सहकारिता के विकास का वर्णन करें।

उत्तर भारत में सहकारिता की शुरुआत विधिवत रूप से सहकारी साख अधिनियम, 1904 के पारित होने के बाद ही हुई। इसके अनुसार गाँव या नगर में कोई भी दस व्यक्ति मिलकर सहकारी साख समिति की स्थापना कर सकते हैं।
लेकिन 1904 में जो अधिनियम पारित हुआ, उसके क्षेत्र को विस्तृत करने के लिए 1912 में सहकारी समिति अधिनियम पारित किया गया, जिसके अनुसार सहकारी साख एवं गैर-सहकारी साख समितियों की स्थापना की व्यवस्था की गई। 1929 के महान आर्थिक मंदी के कारण इसके विकास में कुछ बाधाएँ आ गई, लेकिन रिजर्व बैंक ने 1935 से ही इसमें सक्रिय सहयोग देकर प्रोत्साहित किया है। भारत में योजना काल के 53 वर्षों की अवधि में सहकारिता की अच्छी प्रगति हुई है। 1950-51 में यहाँ 1.8 लाख सहकारी समितियाँ थी, जिनके सदस्यों की संख्या 173 लाख थी जो बढ़कर 2001-02 में क्रमश: 5.28 लाख हो गयी। इस काल में सहकारी समितियों की संख्या तीन गुनी, समितियों के सदस्यों की संख्या में तेरह गुनी वृद्धि हुई है।


10. भारत में सहकारिता की शुरुआत किस प्रकार हुई ? संक्षिप्त वर्णन करें।

उत्तर-भारत में सर्वप्रथम 1904 में एक “सहकारिता साख समिति विधान” पारित हुआ जिसके अनुसार कोई भी दस व्यक्ति मिलकर सहकारी साख समिति की स्थापना कर सकते थे। सन् 1912 में एक और अधिनियम आया जिसके अंतर्गत ऋण के अतिरिक्त अन्य उद्देश्यों के लिए भी केंद्रीय संगठनों की स्थापना की व्यवस्था की गई। अंततः 1914 ई० में मेक्लेगन समिति नियुक्त की गई जिसने इसकी भावी रूप रेखा तैयार की। 1919 के राजनीतिक सुधारों के अनुसार इसे प्रांतीय सरकारों का हस्तांतरित विषय बना दिया गया। इसका संचालन अब राज्य सरकारों के द्वारा होता है।


11. सूक्ष्मवित्त योजना से महिलाएँ किस प्रकार लाभांवित हुई हैं ?

उत्तर-भारत में ऋण के औपचारिक श्रोत जैसे बैंक से ऋण प्राप्त करने के लिए ऋणाधार की आवश्यकता पड़ती है। गरीब महिला के पास प्रायः यह नहीं होता। कर्जदार बही-खाते में गड़बड़ी कर वे उनका शोषण करते हैं। महिलाएँ स्वयं सहायता समूह में अपने आपको संगठित कर लेती है। अपनी बचत-क्षमता का उपयोग कर वे एक पूँजी खड़ा कर लेती हैं। इस पूँजी का उपयोग सदस्यों के छोटे ऋण की जरूरतों के लिए किया जाता है। कुछ वर्षों के क्रिया-कलाप के बाद वे पश्चात स्वयं सहायता समूह बैंक के साथ संबद्ध हो जाते हैं। बैंक उन्हें बिना ऋणाधार के उचित ब्याज-दर पर ऋण उपलब्ध कराता है। इसका उपयोग महिलाएँ स्वरोजगार के अवसर पैदा करने के लिए करती है। महिलाएँ हथकरघा, सिलाई मशीन, पशुपालन, खाद्य प्रसंस्करण आदि में संलग्न हो जाती हैं। इससे वे आत्मनिर्भर बनती है। और उन्हें अपनी क्षमता का उपयोग कर आर्थिक क्षेत्र में योगदान देने का अवसर प्राप्त होता है। स्वयं सहायता समूह की नियमित बैठक में महिलाएँ स्वास्थ्य, पोषण, घरेलू हिंसा आदि विषयों पर चर्चा करती हैं, जिससे उसकी जागरूकता बढ़ती है। ऐसे सृजनात्मक कार्य में भागीदारी से उनका आत्म सम्मान और गौरव भी बढ़ता है। यह महिला सशक्तिकरण की ओर उठाया गया महत्त्वपूर्ण कदम है।


12. स्वयं सहायता समूह क्या है? इसमें महिलाएँ अपनी भूमिका किस प्रकार निभाती है ?

उत्तर- स्वयं सहायता समूह वास्तव में ग्रामीण क्षेत्र में 15-20 व्यक्तियों (खासकर महिलाओं) का एक अनौपचारिक समूह होता है। जो अपनी बचत तथा बैंकों से लघु ऋण लेकर अपने सदस्यों के पारिवारिक जरूरतों को पूरा करते हैं। स्वयं सहायता समूह में 15-20 सदस्य होते हैं जो नियमित रूप से मिलते हैं और बचत करते हैं। एक या दो वर्षों के बाद अगर समूह नियमित रूप से बचत करते हैं तो समूह बैंक से ऋण प्राप्त करने के योग्य हो जाता है। ऋण समूह के नाम पर दिया जाता है और इसका मकसद सदस्यों के लिए स्वरोजगार के अवसरों का सृजन करना है। इससे न केवल महिलाएँ आर्थिक रूप से स्वावलम्बी हो जाती है बल्कि समूह की नियमित बैठकों के जरिए लोगों को सामाजिक विषयों पर चर्चा करने का अवसर भी मिलता है। महिलाएँ दिए गए ऋण के द्वारा छोटे-छोटे कर्ज अपनी गिरवी जमीन छुड़वाने के लिए, कार्यशील पूँजी (बीज, खाद आदि के लिए), घर बनाने, सिलाई मशीन, हथकरघा, पशु इत्यादि सम्पत्ति खरीदने के लिए प्रयोग करती है। इस प्रकार स्वयं सहायता समूह के द्वारा महिलाएँ अपनी जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करती है तथा उनकी स्थिति पहले से बेहतर हो जाती है।


Geography ( भूगोल )  दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

1 भारत : संसाधन एवं उपयोग
2 कृषि ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )
3 निर्माण उद्योग ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )
4 परिवहन, संचार एवं व्यापार
5 बिहार : कृषि एवं वन संसाधन
6 मानचित्र अध्ययन ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )

History ( इतिहास ) दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

1 यूरोप में राष्ट्रवाद
2 समाजवाद एवं साम्यवाद
3 हिंद-चीन में राष्ट्रवादी आंदोलन
4 भारत में राष्ट्रवाद
5 अर्थव्यवस्था और आजीविका
6 शहरीकरण एवं शहरी जीवन
7 व्यापार और भूमंडलीकरण
8 प्रेस-संस्कृति एवं राष्ट्रवाद

Political Science दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

1 लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी
2 सत्ता में साझेदारी की कार्यप्रणाली
3 लोकतंत्र में प्रतिस्पर्धा एवं संघर्ष
4 लोकतंत्र की उपलब्धियाँ
5 लोकतंत्र की चुनौतियाँ

Economics ( अर्थशास्त्र ) दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

1 अर्थव्यवस्था एवं इसके विकास का इतिहास
2 राज्य एवं राष्ट्र की आय
3 मुद्रा, बचत एवं साख
4 हमारी वित्तीय संस्थाएँ
5 रोजगार एवं सेवाएँ
6 वैश्वीकरण ( लघु उत्तरीय प्रश्न )
7 उपभोक्ता जागरण एवं संरक्षण
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