1. भारत : संसाधन एवं उपयोग ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )

Bihar Board ( BSEB ) PDF

1. संसाधनों के विकास में ‘सतत् विकास’ की अवधारणा की व्याख्या करें।

उत्तर ⇒ संसाधन मनुष्य की जीविका का आधार है। जीवन की गुणवत्ता को बनाये रखने के लिए संसाधनों के सतत विकास की अवधारणा आवश्यक है। संसाधन का प्रकृति का उपहार मानकर मानव ने इसका अंधा-धुंध उपयोग करना शरू किया, जिसके कारण पर्यावरणीय समस्याएँ भी उत्पन्न हो गयी है। ससाधना के भण्डार में चिंतनीय ह्रास ला दिया है।
शक्ति सम्पन्न लोगों ने अपने स्वार्थ में संसाधनों का विवेकहीन दोहन किया जिससे विश्व पारिस्थितिकी में घोर संकट पैदा हो गया। भूमंडलीय तापन, ओजोन परत में क्षय, पर्यावरण-प्रदूषण, अम्लीय वर्षा, ऋतु-परिवर्तन जैसे संकट पैदा होते जा रहे हैं। अगर ये परिस्थिति बनी रही तो संसार के सभी मानव का जीवन संकट में पड़ जायेगा।
इन परिस्थितियों से बचने के लिए संसाधनों का नियोजित उपयोग जरूरी है। इससे पर्यावरण को बिना क्षति पहुँचाए भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर वर्तमान विकास को कायम रखा जा सकता है। ऐसी सोच ही सतत् विकास कही जाती है। इससे वर्तमान विकास के साथ भावी पीढ़ी की आवश्यकताएँ भी पूरी होगी और भविष्य भी सुरक्षित रह सकेगा।


2. स्वामित्व के आधार पर संसाधन के विविध स्वरूपों का वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ स्वामित्व के आधार पर संसाधन के चार प्रकार होते हैं –

(i). व्यक्तिगत संसाधन- ऐसे संसाधन किसी खास व्यक्ति के अधिकार क्षेत्र में होता है। जिसके बदले में वह व्यक्ति सरकार को लगान भी चुकाते हैं, जैसे खेती की जमीन, घर, बाग-बगीचा, तालाब आदि ऐसे संसाधन हैं जिसपर व्यक्ति निजी स्वामित्व रखता है।

(ii) सामुदायिक संसाधन- ऐसे संसाधन किसी खास समुदाय के अधीन है होता है जिसका लाभ विशेष समुदाय के लोगों के लिए सुलभ होता है, जैसे चरागाह, श्मशान घाट, मंदिर, मस्जिद, सामुदायिक भवन, तालाब आदि।

(ii) राष्ट्रीय संसाधन- कानूनी तौर पर देश या राष्ट्र के अंतर्गत सभी उपलब्ध. संसाधन राष्ट्रीय हैं। सरकार को यह वैधानिक हक है कि वह व्यक्तिगत संसाधनों का अधिग्रहण आम जनता के हित में कर सकती है। सरकार को अधिग्रहित संसाधन का मुआवजा देना पड़ता है।

(iv) अंतर्राष्ट्रीय संसाधन- ऐसे संसाधनों का नियंत्रण अंतर्राष्ट्रीय संस्था करती है। तट रेखा से 200 किमी० की दूरी को छोड़कर खुले महासागरीय संसाधनों पर किसी देश का आधिपत्य नहीं होता है। ऐसे संसाधनों का उपयोग सिर्फ अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की सहमति से किसी राष्ट्र द्वारा किया जा सकता है।


3. “संसाधन हुआ नहीं करते, बना करते हैं। इस कथन की व्याख्या करें।

उत्तर ⇒ संसार में अनकों प्राकृतिक पदार्थ बिखरे पड़े हैं जब तक उनका उपयोग नहीं किया जाता है वे संसाधन नहीं बन पाते।
मनुष्य उन्हें पता लगाता है, फिर अपनी बुद्धि, विवेक, क्षमता, तकनीक और कुशलता का प्रयोग कर अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए, आर्थिक विकास के लिए उनके उपयोग की योजना बनाता है और उपयोग में लाकर वह उन्हें संसाधन बनाता है। मनुष्य के आर्थिक विकास के लिए संसाधन अति आवश्यक होता है।
नदियाँ तभी संसाधन बन पाती हैं जब मानव उनका उपयोग सिंचाई में, जल विद्युत उत्पादन में, मत्स्यपालन में एवं जलीय यातायात के रूप में और अनेक आर्थिक कार्यों में न किया जाय। सदियों से शोक का कारण बनने वाली नदी, विनाशकारी बाढ़ लाने वाली नदी, हजारों हजार की संख्या में जान माल का क्षति पहुंचाने वाली नदी पर योजना बनाकर बाँध बनाया गया, नहरें निकाली गयी, सिंचाई का काम लिया, विद्युत उत्पादन किए गये जिससे सिंचाई और उद्योग के विकास में मदद मिलने लगी तो वही शोक पैदा करने वाली नदी प्राकृतिक संसाधन बन गई, खुशहाली का कारण बनी। इसीलिए एक भूगोलवेत्ता जिम्मरमैन ने ठीक ही कहा है कि संसाधन हुआ नहीं करते, बना करते हैं।


4. संसाधन से क्या समझते हैं? उदाहरण देकर स्पष्ट करें।

उत्तर ⇒ वातावरण में पाये जाने वाले वे सभी पदार्थ जो हमें उपलब्ध है और हमारे जीवन की विभिन्न आवश्यकताओं को पूरी करे संसाधन कहलाते हैं। परंतु संसाधन तभी कहे जायेंगे जब हमें उन तक पहुँचने की तकनीक की जानकारी हो साथ ही उनके प्राप्त करने, उपयोग करने पर होने वाले खर्च वहन करने की क्षमता हो, श्रम शक्ति हो।
परंतु इसके उपयोग में व्यापक समझ और सूझबूझ की आवश्यकता होती है से वातावरण प्रभावित न हो और प्रकृति के साथ सामंजस्य बना रहे तभी प्रकृति के सभी पदार्थ संसाधन कहे जाते हैं।
उदाहरणस्वरूप छोटानागपुर पठार के खनिज भंडार का युगों तक कोई महत्त्व न था। अतः वे खनिज पदार्थ संसाधन न बन सके। परंतु जब खनिजों का महत्त्व समझा जाने लगा और लोगों ने अपनी कुशलता का प्रदर्शन कर उनको निकालना आरंभ किया तथा उपयोग में लाया गया तो वे खनिज पदार्थ खनिज संसाधन बन गये। जिसने छोटानागपुर क्षेत्र की आर्थिक विकास का अवसर प्रदान किया।


5. संसाधनों के संरक्षण से क्या तात्पर्य है? यह संरक्षण किस प्रकार किया जा सकता है ?

उत्तर ⇒ मानव प्राकृतिक संसाधनों का सृष्टिकर्ता नहीं है इसलिए मानव प्राकृतिक संसाधन को पूँजी समझकर उपयोग करे। इसका तात्पर्य यह है कि संसाधनों के उपयोग में कम-से-कम दुरुपयोग हो, उनकी कम-से-कम बर्बादी हो। मिट्टी जैसी संपदा की उर्वरता बनी रहे, उसे निम्नीकरण या कटाव से बचाया जाय। वन सम्पदा के अत्यधिक उपयोग में लाए जाने पर पुनः स्थापन पर बल देना उनका संरक्षण कहलाता है। अतः संरक्षण से तात्पर्य है संसाधनों का अधिकाधिक समय तक अधिक लोगों के लिए आवश्यकता की पूर्ति हेतु उपयोग हो।
संसार की आबादी का बड़ा भाग कृषि पर आश्रित है और कृषि कार्य के लिए मानव भूमि और मिट्टी का उपयोग करता है। इन संसाधनों का मूल्यांकण किया जाना चाहिए। यदि इनमें कोई कमी है तो उसे पूरा कर उपयुक्त बनाया जाए। यदि वह बर्बाद हो रही है तो किस तरह उसका संरक्षण किया जाए। इसके लिए भूमि का उपयोग इस प्रकार होना चाहिए कि मिट्टी के प्रकार के अनुसार फसलें उगानी चाहिए ताकि भूमि की उत्पादकता बनी रहे और मिट्टी की गुणवत्ता नष्ट न हो।
इस प्रकार जल संरक्षण, वन एवं वन्य प्राणी संरक्षण, खनिज संपदा संरक्षण के लिए भी योजनाबद्ध और विवेकपूर्ण उपयोग किया जाए तो उनसे अधिक से अधिक समय तक लाभ उठाया जा सकता है तथा वे मानव जगत के लिए संरक्षित रह सकते हैं। संसाधनों का योजनाबद्ध, समुचित और विवेकपूर्ण उपयोग ही उनका संरक्षण है। संरक्षण का तात्पर्य कदापि यह नहीं कि प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग न कर उनकी रक्षा की जाए उनके खर्च की आवश्यकता के बावजूद उन्हें बचाकर भविष्य के लिए रखा जाए।


6. शक्ति संसाधनों के संरक्षण हेतु कौन-कौन से उपाय किये जा सकते हैं ? आप इसमें कैसे मदद पहुँचा सकते हैं ?

उत्तर ⇒  शक्ति संसाधन के संरक्षण के लिए निम्न उपाय किए जा सकते हैं –

(i) ऊर्जा के उपयोग में मितव्ययिता- ऊर्जा का उचित एवं आदर्शतम उपयोग होने से ऊर्जा का दुरुपयोग नहीं होता है।

(ii) ऊर्जा के नवीन क्षेत्रों की खोज- ऊर्जा संकट का समाधान नवीन ऊर्जा स्रोतों में निहित होते हैं। इसके लिए सुदूर संवेदी प्रणाली का भी प्रयोग हो रहा है।

(iii) ऊर्जा के नवीन वैकल्पिक साधनों का उपयोग- जो संसाधन समाप्त होने वाले हैं जिनकी पुनरावृत्ति संभव नहीं है, उस संसाधन को संरक्षित करना चाहिए। बदले में ऐसे स्रोत जो न समाप्त होने वाले हैं, ऐसे वैकल्पिक साधनों का प्रयोग किया जाए जैसे जल विद्युत, पवन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, जैव ऊर्जा, सौर ऊर्जा आदि। ये सभी नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोत भी कहे जाते हैं।

(iv) अंतर्राष्ट्रीय सहयोग- ऊर्जा संकट एक वैश्विक समस्या है। जिसे विश्व के देशों को आपसी मतभेद भुलाकर सहयोग एवं समाधान करना चाहिए। आज UNO, OPEC, WTO, G8 जैसे देश इस क्षेत्र में सराहनीय कार्य कर रहे हैं। ऊर्जा का उपयोग हम अपनी जरूरत के हिसाब से करके एवं वेवजह उसका उपयोग न करके शक्ति के संसाधनों का संरक्षण कर सकते हैं।


7. संसाधन के नियोजन से आप क्या समझते हैं? इसकी आवश्यकता पर प्रकाश डालें।

उत्तर ⇒ संसार में संसाधनों का वितरण असमान रूप से फैला हुआ है। किसी। क्षेत्र में यह आवश्यकता से अधिक तो किसी क्षेत्र में आवश्यकता से कम मात्रा में। पाई जाती है। – भारत में तो यह क्षेत्रीय विविधता और भी अधिक है। अतः पूरे देश के विकास के लिए संसाधनों का नियोजन आवश्यक है। मानव की अपने भौतिकवादी जीवन की आवश्यकताएँ बढ़ती जा रही है और उनकी आपूर्ति में संसाधनों का अत्यधिक शोषण करता जा रहा है जिससे अनेकों संसाधन समाप्ति के कगार पर हैं जिसस प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता जा रहा है। यदि संतुलन नष्ट हआ तो मानव का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। इसलिए संसाधन नियोजन की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है।
संसाधन नियोजन की कुछ प्रक्रियाएँ निम्नलिखित हैं –

(i) देश के विभिन्न क्षेत्रों में पाये जाने वाले संसाधनों की पहचान करना,
(ii) संसाधन की मात्रा एवं गुणात्मक स्तर का निर्धारण करना,
(iii) विकास की योजना को चरणबद्ध रूप से तैयार करना,
(iv) समुचित विकास के लिए उचित तकनीक अपनाना,
(v) मजदूरों को प्रशिक्षित करना और सही तकनीक का ज्ञान देना, ”
(vi) राष्ट्रीय स्तर पर योजनाओं का निर्धारण करना जिससे देश की आर्थिक समद्धि हो और नागरिकों का कल्याण हो सके।


8. ऊर्जा संसाधन के महत्त्व पर प्रकाश डालें।

उत्तर ⇒ शक्ति के साधन को ऊर्जा संसाधन भी कहा जाता है। ऊर्जा आधुनिक जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है। ये आर्थिक क्रियाओं के लिए अनिवार्य हो गई है। किसी भी देश के औद्योगिक, कृषि, यातायात के विकास के लिए ऊजो अथ शक्ति के साधनों की आवश्यकता होती है। शक्ति के साधन ही आधुनिक युग में आधार माना जाता है। आर्थिक विकास का सचक होता है। अतः जिन संसाधनों का प्रयोग करके हम मशीनों को चलाते हैं, यातायात के साधनों को गति प्रदान करते हैं, कृषि को यांत्रिक बनाते हैं, घरेलू कार्यों में उपयोग करते हैं, उन्हें ऊर्जा संसाधन कहा जाता है। इसके अभाव में आर्थिक विकास की कल्पना नहीं की जा सकती है।


9. वन को ‘अनुपम संसाधन’ क्यों कहा गया है?

उत्तर ⇒ वन राष्ट्रीय संपत्ति है। एक महत्त्वपूर्ण नवीकरणीय संसाधन है। इससे तापमान में कमी और वर्षा की मात्रा में वृद्धि होती है। जिससे जलवायु अनुकूल बनीं रहती है। वनों से भूमि कटाव कम होता है और नदियों में जल प्रवाह सामान्य बना रहता है। पशु पक्षियों के लिए आवास, चारा और प्राकृतिक वातावरण प्राप्त होता है। वनों से ईंधन, इमारती लकड़ियों के अतिरिस्त उद्योगों के लिए कच्चा माल की प्राप्ति होती है। वन से हमें फल-फूल, कंद-मूल तथा औषधियों की प्राप्ति होती है। जीवन में वनों से अनेकों प्रकार के लाभ उठाते हैं। इसलिए वन को ‘अनुपम संसाधन’ कहा गया है।


10. भारत के आर्थिक विकास में जल संसाधन का योगदान बताएँ।

उत्तर ⇒ भारत के आर्थिक विकास में जल संसाधन का योगदान महत्त्वपूर्ण माना जाता है। घरेल उपयोग से लेकर उद्योग धंधे तथा कृषि कार्य एवं यातायात, जल विद्युत उत्पादन में इसका उपयोग किया जाता है। उद्योग धंधे जैसे—लोहा-इस्पात उद्योग, रसायन उद्योग, कपड़ा उद्योग आदि में ज़ल की अधिक आवश्यकता होती है। जल का सबसे अधिक उपयोग कृषि कार्य में सिंचाई के रूप में किया जाता है। समय पर पर्याप्त मात्रा में सिंचाई फसल के उत्पादकता को बढ़ाता है। इसके लिए धरातलीय और भूमिगत दोनों सिंचाई का सहारा लिया जाता है। पंजाब हरियाणा, राजस्थान और पश्चिम उत्तरप्रदेश में हरित क्रांति की सफलता मूलतः सिंचाई पर ही आधारित है। जल का उपयोग आंतरिक जल मार्ग जैसे-नदी, नहर, झील के रूप में भी किया जाता है। इस तरह जल एक महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय संसाधन है जिसका उपयोग हर क्षेत्र में बढ़ता जा रहा है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि भारत के आर्थिक विकास में जल संसाधन का अत्यधिक योगदान है।


11. मानव किन गुणों के कारण सारे प्राकृतिक संसाधनों के मूल्य में परिवर्तन लाता है ?

उत्तर ⇒ मनुष्य अपनी बुद्धि, प्रतिभा, क्षमता, तकनीकी ज्ञान और कार्य-कुशलता जैसे गुणों का प्रयोग करके प्राकृतिक संसाधनों के मूल्य में परिवर्तन लाता है। मानव अपने साहस, संघर्षशीलता, ज्ञान और सूझबूझ का प्रयोग कर संसाधनों के मल्यो परिवर्तन लाता है। जैसे छोटानागपुर के खनिज भंडार का युगों तक कोई महत्व था, उसका कोई मल्य न था। परंतु जब खनिजों का महत्त्व समझ में आया. उस उपयोगिता समझ में आयी, उसे निकालना आरंभ किया गया और उपयोग में लाया गया तो वही खनिज सम्पदा मल्यवान हो गए। इसी प्रकार नदिया तभी संसाधन बन पायी जब उनका उपयोग सिंचाई में, जल विद्युत उत्पादन में, मत्स्यपालन के लिए एव यातायात के लिए किया जाने लगा। एक भूगोलवेत्ता ने कहा है, “संसाधन की नहीं करते, बना करते हैं।


12. मानव के लिए संसाधन क्यों आवश्यक है ?

उत्तर ⇒ प्रकृति प्रदत्त वस्तुएँ हवा, पानी, वन, वन्य जीव, भूमि, मिट्टी, खनिज संपदा एवं शक्ति के साधन या स्वयं मनुष्य द्वारा निर्मित संसाधन के बिना मनुष्य की जरूरतें पूरी नहीं हो सकती हैं तथा सुख सुविधा नहीं मिल सकती है। मनुष्य का आर्थिक विकास संसाधनों की उपलब्धि. पर ही निर्भर करता है। संसाधनों का महत्त्व इस बात से लगता है कि इनकी प्राप्ति के लिए मनुष्य कठिन से कठिन परिश्रम करता है, साहसिक यात्राएँ करता है, फिर अपनी बुद्धि, प्रतिभा, क्षमता, तकनीकी ज्ञान और कुशलताओं का प्रयोग करके उनके उपयोग की योजना बनाता है, उन्हें उपयोग में लाकर अपना आर्थिक विकास करता है। इसलिए मनुष्य के लिए संसाधन बहुत आवश्यक है। इसके बिना मनुष्य का जीवन एक क्षण भी नहीं चल सकता है।


13. ऊर्जा के गैर-परंपरागत स्रोतों का उल्लेख करें और यह बताएँ कि भारत इस दिशा में किस तरह आगे बढ़ रहा है ?

उत्तर ⇒ ऊर्जा के गैर-परंपरागत स्रोतों में –

(i)पवन ऊर्जा, (ii) ज्वारीय ऊर्जा, (i) सौर-ऊर्जा, (iv) भूताप ऊर्जा एवं (v) जैव पदार्थ ऊर्जा आते हैं। ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार, गैर-परंपरागत ऊर्जा से भारत 95,000 मेगावाट बिजली उत्पन्न कर सकता है। अभी इस दिशा में कुछ का ही उपयोग किया जा रहा है।

पवन ऊर्जा- पवन चक्की द्वारा भूमिगत जल निकालकर देहातों में सिंचाई के अलावा पवन से विद्युत भी उत्पन्न की जाती है। उदाहरण के लिए गुजरात, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, उड़ीसा में जहाँ पवन तेज गति से चला करती है। लगभग 2 हजार पवन चक्कियाँ लगाई गई हैं और 5 लाख यूनिट विद्युत उत्पन्न किया जाता है।

ज्वारीय ऊर्जा- कच्छ और खंभात की खाड़ी में जहाँ ऊँचे ज्वार उठते हैं ज्वारीय ऊर्जा उत्पन्न की जाती है।

सौर-ऊर्जा-भारत उष्णकटिबंध में स्थित होने के कारण असीम सौर ऊर्जा उत्पन्न कर सकता है। अभी गुजरात में भुज के पास इसका सबसे बड़ा संयंत्र लगाया गया है। थार मरुस्थल में भी इसकी असीम सम्भावनाएँ हैं।

बायो गैस ऊर्जा- गोबर और मल-मूत्र से उत्पन्न ऊर्जा गोबर गैस संयंत्र लगाकर प्राप्त किया जा सकता हैं, इससे गाँव में विद्युत की आवश्यकता पूरी की जा सकता है।


14. भारत में सौर ऊर्जा का भविष्य उज्ज्वल है। इस कथन की पुष्टि करें।

उत्तर ⇒ भारत ऊष्ण कटिबंधिय देश है, यहाँ अधिक समय धूप मिलती है। इसलिए सौर ऊर्जा उत्पन्न करने की यहाँ असीम संभावनाएं हैं। यहाँ प्रतिवर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 20 मेगावाट सौर ऊर्जा उत्पन्न की जा सकती है। _ फोटोवोल्टाइक प्रौद्योगिकी द्वारा धूप को सीधे विद्युत में बदला जा सकता है। सूर्य की ऊर्जा से विद्युत उत्पन्न कर सौर चूल्हे और सौर विद्युत गृह का निर्माण किया जा सकता है।
सीजियम और कुछ अन्य धातुओं में यह विशेषता पायी जाती है कि थोड़ा गम होने पर भी उनमें से इलेक्ट्रॉन बाहर निकलने लगते हैं, इसी प्रवाह को बिजली कहत हैं। सूर्य के प्रकाश में यह क्रिया बिना खर्च के हो सकती है। जिन स्थानों पर दिन के समय आसमान खुला रहता है वहाँ आसानी से सौर ऊर्जा प्राप्त किया जा सकता है। ऐसे गाँव में जहाँ बिजली का अभाव रहता है सरकार द्वारा ग्रामीणों को साला लैंप, सोलर चूल्हे उपलब्ध कराये जा रहे हैं।
अभी भारत के गुजरात राज्य में भुज के निकट इसका सबसे बड़ा संयंत्र लगाया गया है। थार मरुस्थल में भी इसका बड़ा संयंत्र स्थापित किया जा सकता है।


15. ऊर्जा संकट दूर करने के लिए ऊर्जा के किन स्रोतों को विकास करने की आवश्यकता है ? इसके लिए कौन से प्रयास किया रहे हैं ?

उत्तर ⇒ भारत में परंपरागत ऊर्जा के साधन सीमित हैं और दिनों दिन विधुत की माँग कृषि , उद्योग परिवहन तथा दैनिक जीवन में बढ़ती जा रही है। अत: विधुत का उत्पादन बढ़ाना आवश्यक हो गया है। इसके लिए उर्जा के गैर-परंपरागत स्रोतों को विकसित करने कीआवश्यकता है। इसके लिए आयोग बनाये गये और परागत ऊर्जा स्रोत विभाग स्थापित किए गए हैं। इस दिशा में अन्य ऊर्जा जों की खोज की जा रही है। इसमें सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, जैविक उर्जा तथा अपशिष्ट पदार्थ से उत्पन्न ऊर्जा को विकसित करने पर बल दिया जा रहा है। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में गोबर गैस प्लांट स्थापित कर ऊर्जा की प्राप्ति जाती हैं । आजकल शहरों में भी सड़कों पर रोशनी के लिए बायोगैस का प्रयोग किया जा रहा है।


16. खनिज कितने प्रकार के होते हैं? प्रत्येक का सोदाहरण परिचय दीजिए।

उत्तर ⇒ सामान्यतः खनिजों को दो वर्गों में बाँटा जाता है-

(i) धात्विक खनिज- ऐसे खनिजों में धातु मौजूद रहते हैं। ये धातु किसी-न-किसी धातु के साथ मिले होते हैं। जैसे लौह अयस्क, ताँबा, निकेल आदि। नह धातु की उपस्थिति के आधार पर धात्विक खनिज को भी दो उप-भाग में बाँटा जाता है।
(क) लौह युक्त धातु (ख) अलौह युक्त धातु

  • लौह युक्त धातु में लोहा के अंश अधिक होते हैं, जैसे-लौह अयस्क, मैंगनीज, निकेल, टंगस्टन आदि।
  • अलौह धातु में लोहा के अंश बहुत कम होते हैं, जैसे—सोना, चाँदी, बॉक्साइट, टिन, ताँबा आदि।

(ii) अधात्विक खनिज-ऐसे खनिजों में धातु नहीं होते हैं, जैसे चूना पत्थर, डोलोमाइट, अभ्रक, जिप्सम आदि। जीवाश्म की उपस्थिति के आधार पर अधात्विक खनिज को भी दो भागों में बाँटा जाता है ।

  • (क) कार्बनिक खनिज—ऐसे खनिज का निर्माण भू-गर्भ में प्राणी एवं पेड़-पौधों के दबने से होता है। जैसे—कोयला, पेट्रोलियम, चूना पत्थर आदि।
  • (ख) अकार्बनिक खनिज—ऐसे खनिजों में जीवाश्म की मात्रा नहीं होते हैं, जैसे—अभ्रक, ग्रेफाइट आदि।

17. भारत के प्रमुख तीन धात्विक खनिजों का विवरण बताएँ।

उत्तर ⇒ धात्विक खनिज ऐसे खनिज होते हैं जिन्हें शुद्ध करने के बाद इच्छित रूप में ढाला जाता है। धात्विक खनिज को लौह तथा अलौह खनिजों में बाँटा जाता है। प्रमुख धात्विक खनिजों में लोहा, मैंगनीज, बॉक्साइट और ताँबा है। इनका विवरण इस प्रकार हैं –

(i) लौह अयस्क- भारत में लौह अयस्क का संचितं भंडार बहुत अधिक है। यहाँ उच्च कोटि के हेमाटाइट और मैग्नेटाइट लौह अयस्क पाये जाते हैं। . भारत का सर्वप्रमुख लौह क्षेत्र झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, गोवा इत्यादि राज्यों में है।

(ii) मैंगनीज अयस्क- भारत में मैंगनीज का भंडार विश्व के भंडार का 20% पाया जाता है। इस खनिज के प्रमुख भंडार उड़ीसा, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और गोवा राज्य में हैं। भारत का मैंगनीज उच्च कोटि का है, यह धात्विक खनिज जो इस्पात बनाने में काम आता है।

(iii) बॉक्साइट अयस्क- एक अनुमान के अनुसार भारत में बॉक्साइट का विशाल भंडार है। इस खनिज से एलुमिनियम निकाला जाता है। भारत में इसके भंडार झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक राज्य में पाये जाते हैं।


18. कोयले का वर्गीकरण कर उनकी विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर ⇒ कार्बन की मात्रा के आधार पर कोयले को चार वर्गों में रखा जाता हैं –

(i) एंथासाइट- यह सर्वोच्च कोटि का कोयला है जिसमें कार्बन की मात्रा 90% तक पायी जाती है। जलने पर धुआँ नहीं देता और देर तक ऊष्मा देता है। इसे कोकिंग कोयला भी कहा जाता है। इसे धातु गलाने में प्रयोग किया जाता है।

(ii) बिटुमिनस- इस प्रकार के कोयला में कार्बन की मात्रा 70 से 90% तक पाया जाता है। इसे परिष्कृत कर कोकिंग कोयला बनाया जाता है। भारत में अधिकतर इसी प्रकार का कोयला मिलता है।

(iii) लिगनाइट- यह निम्न कोटि का कोयला है। इसमें 30 से 70% तक कार्बन पाया जाता है। इसमें ऊष्मा कम और धुआँ अधिक होता है। इसे भूरा कोयला भी कहते हैं।

(iv) पीट-इसमें कार्बन की मात्रा 30% से भी कम पायी जाती है। इस प्रकार | का कोयला पूर्व के दलदली भागों में मिलता है।


19. अभ्रक की उपयोगिता एवं वितरण पर प्रकाश डालें ।

उत्तर ⇒

अभ्रक की उपयोगिता- अभ्रक एक विद्यतरोधी अधात्विक खनिज है। विधुतरोधी होने के कारण इस खनिज का सबसे अधिक प्रयोग विद्युत उपकरण क निर्माण में किया जाता है। इसके अतिरिक्त इसका उपयोग साज-सज्जा सामग्रियाँ,
रोगन की वस्तुओं के निर्माण में भी होता है।

अभ्रक का वितरण- अभ्रक के उत्पादन में भारत विश्व में प्रथम स्थान रखता है। भारत में अभ्रक की तीन पट्टियाँ हैं जो बिहार, झारखण्ड, आंध्रप्रदेश तथा राजस्थान राज्यों में विस्तृत हैं। भारत में अभ्रक का कुल भंडार 59,065 टन है। बिहार झारखण्ड में उत्तम कोटि का ‘रूबी अभ्रक’ का उत्पादन होता है। बिहार में गया, गेर भागलपुर, नवादा जिलों में इसका उत्पादन होता है। झारखंड में हजारीबाग, बाद पलाम, राँची और सिंहभूम जिलों में अभ्रक की खाने हैं। बिहार और झारखण्ड मिलकर देश का 80% अभ्रक का उत्पादन करता है। आंध्रप्रदेश के नेल्लूर जिला, राजस्थान अंतर्गत उदयपुर, जयपुर, भीलवाड़ा, अजमेर आदि जिलों में अभ्रक निकाला जाता है ।


20. लौह-अयस्क का वर्गीकरण एवं उनकी विशेषताओं को लिखिए।

उत्तर ⇒ लौह-अयस्क में उपस्थित लौहांश की मात्रा के आधार पर लौह अयस्क को तीन भागों में वर्गीकृत किया जाता है-

(i) हेमेटाइट (ii) मैग्नेटाइट. (i) लिमोनाइट .

(i) हेमेटाइट- इस लौह-अयस्क में लौहांश सबसे अधिक 70% तक पाया । जाता है। इससे लकीर खींचने पर लाल उगता है जिसके कारण इसे लाल अयस्क भी कहा जाता है। भारत में लगभग 12,317 मिलियन टन इसका भंडार उपलब्ध है।

(ii) मैग्नेटाइट- इसमें लौहांश की मात्रा 60% होती हैं। घिसने पर काला रंग दिखता है। अतः इसे काला अयस्क के नाम से जाना जाता है। भारत में इसके 540 मिलियन टन भंडार उपलब्ध हैं।

(iii) लिमोनाइट- यह सबसे घटिया किस्म का लौह-अयस्क है जिसमें लौहांश की मात्रा 40% से भी कम होता है। इसे पीला अयस्क के नाम से जाना जाता है। भंडार का आकलन उपलब्ध नहीं है।


21. ताँबा भारत के किन-किन क्षेत्रों में मिलता है? इसके वितरण और उपयोग पर प्रकाश डालें।

उत्तर ⇒ भारत में ताँबा मुख्य रूप से मध्यप्रदेश, झारखंड, राजस्थान, आंध्रप्रदेश, सिक्किम राज्यों में मिलता है। इसका सर्वाधिक उत्पादन झारखंड और राजस्थान में किया जा रहा है। झारखंड में इसकी खाने सिंहभूम जिले के घाटशिला के पास है। पलामू जिले में भी इसके विशाल भंडार मिले हैं। राजमहल क्षेत्र में भी ताँबे के भंडार का पता चला है। राजस्थान में झुनझुन और अलवर जिले में ताँबे की खानें हैं। भारत ताँबा उत्पादन में आत्मनिर्भर नहीं है। भारत ताँबा का आयातक देश हैं।ताँबा बिजली का सुचालक है अतः बिजली के तार, बल्ब, मोटर इंजन, रेडियो आदि में इसका उपयोग किया जाता है। पहले घरेलू बरतन और सिक्के भी बनाये जाते थे। ताँबा और जस्ता मिलाकर पीतल बनाया जाता है। साथ ही ताँबा में टिन मिलाने पर काँसा तैयार होता है।


22. भारत में खनिज तेल के वितरण का वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ भारत में मुख्यतः पाँच तेल उत्पादक क्षेत्र हैं –

(i) उत्तर -पूर्वी प्रदेश–भारत का यह सबसे पुराना तेल उत्पादक क्षेत्र है। ऊपरी असम घाटी, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड के तेल क्षेत्र इसके अंतर्गत आते हैं। असम, डिगबोई, नहरकटिया, मोरान, रूद्रसागर और अरुणाचल प्रदेश में निगरू, नागालैंड का बोरहोल्ला प्रमुख उत्पादक क्षेत्र हैं।

(ii) गुजरात क्षेत्र-यहाँ खंभात के बेसीन और मैदानी क्षेत्र में तेल का क्षेत्र फैला हुआ है। यहाँ अंकलेश्वर, कलोल, नवगाँव, कोसाबा, मेहसाना से तेल निकाला जाता हैं।

(iii) मुंबई हाई क्षेत्र- यह. क्षेत्र मुंबई तट से 176 किमी० दूर उत्तर ⇒पश्चिम दिशा में अरब सागर में स्थित है। यहाँ समुद्र में सागर सम्राट मंच बनाकर तेल निकालने का कार्य किया जाता है।

(iv) पूर्वी तट प्रदेश- कृष्णा, गोदावरी, कावेरी नदियों के बेसीन में भी तेल की खोज की गई है।

(v) बाड़मेर बेसिन- इस बेसीन के मंगला तेल क्षेत्र से हाल ही में तेल उत्पादन शुरू हुआ है। यहाँ प्रतिदिन 56,000 बैरल तेल का उत्पादन हो रहा है। 2012 तक यह क्षेत्र भारत का 20% तेल उत्पादन करने लगेगा।


23. भारत में कोयला का कुल भंडार कितना है? कोयला का वार्षिक उत्पादन क्या है ? इसके दो महत्त्वपूर्ण उत्पादक क्षेत्रों का विवरण दें तथा दो उपयोग बताएँ।

उत्तर ⇒ भारतीय भू-गर्भ सर्वेक्षण विभाग के अनुसार भारत में कोयला का . भंडार 264.45 अरब टन है। इनमें 98% कोयला का भंडार प्राचीन गोंडवाना काल
का है और 2% टर्शियरी काल का। गोंडवाना काल का भंडार झारखंड, पश्चिमा बंगाल, उड़ीसा; आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र की गोंडवाना चट्टानों में मिलती है और टर्शियरी काल का भंडार असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड तथा जम्मू-कश्मीर की टर्शियरी काल की चट्टानों में पाया जाता है।
वर्तमान समय में भारत में 45.6 करोड़ टन वार्षिक कोयले का उत्पादन किया जा रहा है। भारत में दामोदर घाटी के रानीगंज, झरिया, गिरिडीह, बोकारो, कर्णपुरा स कोयले का उत्पादन किया जा रहा है। यहाँ भारत का आधे से अधिक कोयला निकाला जाता है। यहाँ उच्च काट का कोयला प्राप्त होता है। कोयले का दूसरा मुख्य उत्पादक क्षेत्र मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और उडीसा राज्यों में है। ये पहाडी और दुर्गम क्षेत्र है। यहाँ मध्यप्रद में सिंगरौली, छत्तीसगढ़ में कोरबा, उड़ीसा में तालचर उत्पादन के लिए प्रमुख है।

कोयले का उपयोग- कोयले का सबसे अधिक उपयोग ताप विद्युत् उत्पा में किया जाता है और कोयले का दूसरा बड़ा उपयोग लौह इस्पात उद्योग में होता है।


24. प्रदूषण को नियंत्रित करने के उपायों का वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ पर्यावरण का दूषित होना ही प्रदूषण कहलाता है। वर्तमान समय में दश में बढ़ते औद्योगिकरण ने प्रदूषण को बढावा दिया है। प्रदूषण के अन्तर्गत जल-प्रदूषण, वाय प्रदषण, भमि प्रदषण, ध्वनि प्रदषण आदि को शामिल किया जाता है। प्रदूषण हमार स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के लिए हानिकारक होते हैं अतः इसे नियंत्रित किया जाना चाहिए।
प्रदूषण को निम्न तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है –

(i) उद्योगों को निर्धारित क्षेत्रों में स्थापित करके।
(ii) उपकरणों की गुणवत्ता को बनाये रखकर।
(iii) धुआँ रोकने के लिए कोयले के स्थान पर तेल का प्रयोग करके।
(iv) प्रदूषित जल को नदियों में छोड़ने से पहले उपचारित करना।
(v) औद्योगिक कचरे को पृथक करके।

इस तरह से हम ऊपर लिखित तरीकों को अपनाकर प्रदूषण को नियंत्रित कर सकते हैं।


25. भूमि किस प्रकार महत्त्वपूर्ण संसाधन है ?

उत्तर ⇒ हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भूमि एक महत्त्वपूर्ण संसाधन है। आवास बनाने के लिए यातायात के साधन के लिए, कृषि के लिए, पशुपालन के लिए चारागाह, खनिज क्षेत्र, उद्योग क्षेत्र, व्यापार केंद्र, शिक्षा के लिए विद्यालय, महाविद्यालय, स्वास्थ्य के लिए हॉस्पिटल आदि कार्यों के लिए भूमि की आवश्यकता होती है।
भूमि की प्रकृति हमारे क्रियाकलापों को प्रभावित करती है। पठारी भूमि खनिजों से भरी होती है तो यहाँ खनन कार्य किया जाता है। खनिजों पर आधारित उद्योग स्थापित किए जाते हैं। समतल मैदानी भाग में वर्षा जल या सिंचाई की सुविधा होने पर अच्छी फसल उत्पादन किया जाता है। पहाड़ी भागों से वन उत्पाद प्राप्त किए जाते हैं और सीढ़ीनुमा खेत बनाकर उत्पादन लिया जाता है। इस प्रकार भूमि महत्त्वपूर्ण संसाधन है।


26. आर्थिक विकास के साधन के रूप में मानव के महत्त्व पर प्रकाश डालें।

उत्तर ⇒ मानव अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए स्वयं अपना और अपनी विभिन्न तकनीकों का उपयोग करता है तथा प्रकृति की अन्य वस्तओं का उपयोग में लान का याग्यता मानव म हा है। मानव खोज करने की क्षमता का न रहे तो सारे प्राकृतिक पदार्थ यों ही पड़े रह जाए। इस तरह यह कहा जा सकता है कि सभी प्राकृतिक वस्तुएँ मानव की क्षमता के बिना अविकसित रह जा सकती है।
निःसंदेह, मानव ही अपने सांस्कृतिक एवं तकनीकी के सहारे सभी प्राकृतिक साधनों के मल्य में परिवर्तन लाता है। इसके लिए औद्योगिकीकरण की आवश्यकता होती है। औद्योगिक विकास मानव की क्षमता और तकनीकी कुशलता पर निर्भर करता है। वर्तमान समय में औद्योगिक विकास के कारण प्राकृतिक संसाधनों का अधिक उपयोग किया जा रहा है।
अतः स्पष्ट है कि आर्थिक विकास में मानव का महत्त्व सर्वाधिक है इसके बिना आर्थिक विकास की गाड़ी आगे नहीं बढ़ सकती।


27. नदी घाटी परियोजनाओं को बहुउद्देशीय परियोजना क्यों कहा जाता है ?

उत्तर ⇒ निम्नलिखित कारणों से नदी घाटी परियोजनाओं को बहुउद्देशीय परिवार हा जाता है-

(i) सूखे से प्रभावित क्षेत्रों में नदी के जल को नियंत्रित करके खेतों की सिंचाई की जाती है।
(ii) नदियों पर बाँध बनाकर बाढ़ की विभीषिका से लोगों को बचाया जाता है।
(iii) नदी-घाटी योजनाओं से जल-विद्युत उत्पन्न किया जाता है।
(iv) जलाशयों में मछली पालन को वृहत रूप से विकसित किया जाता है।
(v) नदी के संचित जल को कारखानों में उपयोग किया जाता है।
(vi) जल को शुद्ध कर पाइपों द्वारा शहरों में लाया जाता है और उसका दैनिक उपयोग किया जाता है।
(vii) गहरे जल में नाव चलाए जाते हैं जो यातायात एवं माल ढोने में सहयोग देता है।
(viii) नदी में बाँध बनाकर नहरें निकाली जाती हैं। उसके दोनों किनारे पर उपयोगी वृक्षों को लगाया जाता है और भूमि पर पशुचारण के लिए उपयोग किया जाता है।


28. मृदा संरक्षण पर एक निबंध लिखिए।

उत्तर ⇒ मृदा प्रकृति का एक महत्त्वपूर्ण संसाधन है। यह न केवल पौधों का विकास करती है बल्कि धरती पर के विविध प्रकार के प्राणियों को भोजन प्रदान कर जिन्दा रखती है। मृदा की उर्वरता मानव के आर्थिक क्रियाकलाप को प्रभावित करती और देश की योजनाओं को सफल बनाने में सहायक होती है। इसके नष्ट होने से प्रकृति की एक बहुमूल्य सम्पत्ति समाप्त हो जाएगी। इसलिए इसका संरक्षण जरूरी है।
किंतु जो मृदा मानवीय जीवन के सहारा का साधन बना, उसी मिट्टी का मानव ने अत्यधिक लालच के चक्कर में पड़कर शोषण और दोहन करना शुरू कर दिया। वनों की कटाई, अति पशुचारण, उर्वरकों का अत्यधिक प्रयोग, कीटनाशकों का प्रयोग, अत्यधिक सिंचाई, खनन के बाद गड्ढों को खुला छोड़ देना आदि अनेक मानवीय क्रियाकलापों से मिट्टी का क्षरण होता जा रहा है और भूमि अपरदन को बढ़ावा मिल रहा है। अतः मृदा जैसी महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक संपदा नष्ट होती जा रही है।
अतः मानव सभ्यता एवं संस्कृति को बचाने हेतु मृदा संरक्षण आवश्यक है। इसके लिए फसल चक्रण, पहाड़ी क्षेत्रों में खेतों की समोच्च जुताई, वर्षा जल संचयन, जल का संरक्षण, भूमिगत जल की पुनर्पूर्ति आदि करके मृदा को बर्बाद होने से बचाया जा सकता है।


29. विस्तारपूर्वक बताएँ कि मानव क्रियाएँ किस प्रकार प्राकृतिक वनस्पति और वन्यजीवों के ह्रास के कारक हैं ?

उत्तर ⇒ वनस्पति, मानव को दिया गया प्रकृति का एक अमूल्य उपहार है। ये वनस्पतियाँ कई प्रकार से मनुष्य के जीवन की रक्षा करते हुए विकास को गतिशील बनाने में सहायक होती हैं। विकास के इस दौर में मानव प्रकृति के इस अमूल्य योगदान को भूलता जा रहा है।
मानव ने विकास के नाम पर सड़कों, रेलमार्गों, शहरों का निर्माण करना शुरू किया। इसके लिए पेड़ों की अंधाधुंध कटाई की गयी। जिससे वनों का नाश होने लगा, वन्य प्राणियों का आश्रय स्थल ही उजड़ने लगा।
कृषि से अत्यधिक उपज के लिए अत्यधिक सिंचाई, रासायनिक खाद का प्रयोग किया गया। इसके कारण एक ओर भूमि निम्नीकरण से वनों को नुकसान हुआ तो दूसरी ओर जलों के दुषित होने से जीव-जंतु के अस्तित्व पर ही खतरा मंडराने लगा। कल-कारखाने स्थापित करने के लिए वनों की कटाई की गयी। पुनः इन कल-कारखानों से निकलने वाले धुआँ और कचरों ने वायु और जल को दुषित किया, जिससे अम्लीय वर्षा के कारण वन और वन्य प्राणियों पर खराब प्रभाव पड़ा।
वनों के ह्रास ने प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ दिया, जिससे जलवायु पारखा जैसी समस्या सामने आने लगी है।


30. विभिन्न प्रकार के भारतीय वनों का तलनात्मक विवरण परस्तुत करें। इनमें किसे सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है ? और क्यों ?

उत्तर ⇒ धरातलीय स्वरूप, मिट्टी और जलवायु की दशाओं में विविधता कारण भारत में विभिन्न प्रकार के वन पाये जाते हैं जो निम्न प्रकार के है।

(i) चिरहरित वन या सदाबहार वन ।
(ii) पर्णपाती वन या पतझड़ वन ।
(iii) पर्वतीय वन या कोणधारी वन ।
(iv) डेल्टाई वन या ज्वारीय वन ।
(v) कटीले वन या मरुस्थलीय वन ।

(i) सदाबहार वन- भारत में सदाबहार वन सघन होते हैं। इन्हें काटना, वनों बाहर निकालना और उपयोग में लाना कठिन होता है। इनकी लकड़ी कड़ी होती है। इनमे कई जाति के वृक्ष एक साथ मिलते हैं। अधिक वर्षा और दलदली भमि के कारण यातायात में कठिनाई होती है। इसलिए लकड़ियों का सही उपयोग नहीं हो पाता है। इनमें एबॉनी और महोगनी मुख्य वक्ष पाये जाते हैं।

(ii) पतझड़ वन- ये आर्थिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं। इनमें सागवान और साल मुख्य वृक्ष पाये जाते हैं। अन्य वक्षों में अंजन चंदन चिरौंजी हरें-वडेटा आँवला, शहतूत, बरगद, पीपल, कटहल, आम, जामन, नीम, नारियल, बाँस मानसूनी न के रूप में पाये जाते हैं। ये न तो अधिक घने होते हैं और न इनकी लकड़ी अधिक कठोर ही। इनकी लकड़ियाँ उपयोगी होती है।

(iii) कोणधारी वन- यह वन पर्वत के अधिक ऊँचाई पर पाए जाते हैं। इनमें देवदार, चीड़, हेमलॉक स्प्रुस जाति के पेड़ पाए जाते हैं। इनकी लकड़ियाँ मुलायम होती है। इन्हें काटना और उपयोग में लाना आसान होता है।

(iv) ज्वारीय वन- तटीय भागों में इस प्रकार के वन पाए जाते हैं। इनमें वृक्षों की बहुतायत रहती है। लकड़ियाँ जलावन और छोटी नाव बनाने के काम आती है। इनमें सुंदरी वृक्ष, केवड़ा, मैंग्रोव, हिरिटिरा गरोन आदि मुख्य वृक्ष हैं, ताड़ और नारियल के पेड़ भी मिलते हैं।

(v) मरुस्थलीय वन- कम वर्षा वाले क्षेत्रों में पाये जाते हैं। इनमें बबूल एवं खजूर के पेड़ पाए जाते हैं। नागफनी और कैकटस जाति की झाड़ियाँ भी पायी जाती है। भौगोलिक दृष्टिकोण से सभी प्रकार के वनों का महत्त्व है। परन्तु इनमें से पतझड़ वन का सर्वाधिक महत्व है क्योंकि इस वन की लकड़ियाँ आर्थिक दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण एवं उपयोगी है।


31. भारत में पायी जाने वाली मिट्टी को कितने वर्गों में बाँटा गया है ?किन्हीं तीन प्रकार की मिट्टी की विशेषताओं और उनके क्षेत्र को लिखें।

उत्तर ⇒ भारत की मिट्टी को आठ मुख्य वर्गों में बाँटा है। जो निम्न प्रकार हैं –

(i) जलोढ़ मिट्टी, (ii) काली मिट्टी, (iii) लाल मिट्टी, (iv) लैटेराइट मिट्टी, (v) पहाड़ी मिट्टी, (vi) मरुस्थलीय मिट्टी, (vii) लवणीय एवं क्षारीय मिट्टी, (viii) जैविक मिट्टी।

(i) जलोढ मिटी- यह मिट्टी नदियों द्वारा बहाकर लायी गई और नदियों के बेसीन में जमा की गई मिट्टी है। समुद्री लहरों के द्वारा भी ऐसी मिट्टी तटों पर जमा की जाती है।
भारत में जलोढ़ मिट्टी मुख्य रूप से गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन एवं पूर्वी तटीय भागों में पाई जाती है। इस मिट्टी की विशेषता यह है कि इसमें सभी प्रकार के खाद्यान्न, दलहन, तेलहन, कपास, गन्ना, जूट और सब्जियाँ ऊगाई जाती हैं। इसमें नाइट्रोजन और फॉसफोरस की कमी पायी जाती है जिसके लिए उर्वरक का सहारा लेना पड़ता है। आयु के आधार पर इसे बांगर और खादर के रूप में बाँटा जाता है।

(ii) काली मिट्टी – स्थानीय स्तर पर इसे रेगुर भी कहा जाता है। इसका निर्माण दक्षिण के लावा (बेसाल्ट क्षेत्र) वाले भागों में हुआ है। कपास और गन्ने के उत्पादन के लिए यह मिट्टी अच्छी मानी जाती है। इसका बड़ा क्षेत्र महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मध्यप्रदेश, कर्नाटक में पाया जाता है। इसमें नमी बनाये रखने की क्षमता होती है और सूखने पर बहुत कड़ी हो जाती है।

(iii) लाल मिट्टी- यह ग्रेनाइट चट्टान के टूटने से बनी मिट्टी है। यह मिट्टी दक्षिण के पठार और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में मिलता है। तमिलनाडु के दो-तिहाई भाग में यह मिट्टी पायी जाती है। यह कम उपजाऊ मिट्टी होती है। इसमें सिंचाई का अधिक आवश्यकता पड़ती है। इसमें विशेषकर मोटे किस्म के अनाज उत्पादन किए जाते हैं।


32. वृक्षों के घनत्व के आधार पर वनों का वर्गीकरण कीजिए और सभी वनों का वर्णन विस्तार से कीजिए।

उत्तर ⇒ वृक्षों के घनत्व के आधार पर वनों को पाँच वर्गों में बाँटा गया हैं-

(i) अत्यंत सघन वन- ऐसे वन अत्यधिक घने होते हैं। भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र के 1.66% भाग पर इस प्रकार के वन पाये जाते है। मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा, मेजोरम, अरुणालच प्रदेश में मुख्य रूप प्रकार के वन पाये जाते हैं। इन्हें चिरहरित वन या सदाबहार वन भी कहा जाता है।

(ii) सघन वन- इस प्रकार के वनों में वक्षों का घनत्व 40 से 70% तक पाया जाता है। हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, मध्यप्रदेश, जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र एवं उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में इसी प्रकार के वन पाये जाते हैं। कुल भौगोलिक क्षेत्र के 3% भाग में यह वन फैला हुआ है। खले वन इन वनों में वृक्षों का घनत्व 10 से 40% तक पाया जाता है। इस प्रकार के वृक्ष कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा के कुछ भाग में मिलता है। भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के 7.12% भू-भाग पर खुले वन का फैलाव है।

(iv) झाड़ियाँ एवं अन्य वन- ऐसे वनों में वृक्षों का घनापन 10% से कम होता है। राजस्थान एवं अन्य अर्द्धशुष्क प्रदेशों में इस प्रकार के वन मिलते हैं। भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 8.68% क्षेत्र पर इसी प्रकार के वन मिलते हैं। .

(iv) मैंग्रोव वन- भारत के तटीय राज्यों में इस प्रकार का वन पाया जाता है। इसका आधार क्षेत्र पश्चिम बंगाल के सुंदरवन में है। देश के कुल भौगोलिक, क्षेत्र का 0.14% भाग मैंग्रोव वन के अंतर्गत है।


33. जल विद्युत उत्पादन हेतु अनुकूल भौगोलिक एवं आर्थिक कारकों का विवेचना करें।

उत्तर ⇒ जल विद्युत उत्पादन हेतु अनुकूल भौगोलिक कारक निम्नलिखित हैं –

(i) प्रचुर जल राशि का उपलब्ध होना,
(ii) नदी भाग में ढाल का होना,
(iii) जल का बहाव तेज होना,
(iv) प्राकृतिक जलप्रपात का होना आदि।

आर्थिक कारक –

(i) सघन औद्योगिक आबादी क्षेत्र,
(ii) बाजार,
(iii) प्रर्याप्त पूँजी निवेश, |
(iv)परिवहन का साधन,
(v) प्राविधिक ज्ञान,
(vi) अन्य ऊर्जा स्रोत का अभाव।


34. .भारत की किन्ही चार परमाणु विद्युत गृह का उल्लेख कीजिए एवं उनकी विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर ⇒ भारत के चार परमाणु विद्युत गृह निम्न प्रकार हैं

(i) तारापुर परमाणु विद्युत गृह – यह एशिया का सबसे बड़ा परमाणु विद्युत गृह है। यहाँ जल उबालने वाली दो परमाणु भट्टियाँ हैं। प्रत्येक का उत्पादन क्षमता 200 मेगावाट से अधिक है। यहाँ थोरियम से प्लूटोनियम बनाकर विद्युत उत्पन्न किया जाता है।

(ii) राणा प्रताप सागर परमाणु विद्युत-  यह राजस्थान स्थित कोटा में है। इसे चंबल नदी से जल प्राप्त होता है। कनाडा के सहयोग से इसका निर्माण हआ है। इसकी उत्पादन क्षमता 100 मेगावाट है। हाल ही में 235 मेगावाट की दो इकाइयाँ शुरू की गयी हैं।

(ii) कलपक्कम परमाणु विद्युत गृह– स्वदेशनिर्मित इस परमाणु विद्युत गृह की स्थापना तमिलनाडु में की गयी है। यहाँ 335 मेगावाट के दो रिएक्टर कार्य कर

(iv) नरौरा परमाणु विद्युत गृह- यह उत्तरप्रदेश के बुलंदशहर के समीप | स्थित है। यहाँ भी 235 मेगावाट की दो रिएक्टर हैं।


35. संक्षिप्त भौगोलिक टिप्पणी लिखें। भाखड़ा नांगल परियोजना, दामोदर घाटी परियोजना, कोसी परियोजना और तुंगभद्रा परियोजना।

उत्तर ⇒

भाखड़ा नांगल परियोजना- यह सतलज नदी पर बनायी गयी भारत | की सबसे बडी नदी परियोजना है। यह विश्व का सबसे ऊँचा बाँध है। इसपर चार शक्ति गृह स्थापित हैं, जिससे 7 लाख किलोवाट विद्युत उत्पन्न किया जाता है। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तरांचल, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान तथा जम्मू-कश्मीर, राज्यों के कृषि एवं औद्योगिक विकास में सहायक हुआ है।
दामोदर घाटी -परियोजना-झारखंड एवं पश्चिमी बंगाल को दामोदर नदी की। प्रलयंकारी बाढ़ से बचाने के लिए एवं जल विद्युत उत्पन्न करने के लिए तिलैया. मैथन, कोनार और पंचेत पहाड़ी में बाँध बनाकर इस परियोजना का विकास किया गया है। यहाँ 1300 मेगावाट जल विद्युत उत्पन्न किया जाता है। इससे बिहार झारखण्ड एवं पश्चिमी बंगाल को लाभ पहुँचता है।

कोसी परियोजना – उत्तरी बिहार की अभिशाप कोसी नदी पर हनुमान नगर । में बाँध बनाकर इस परियोजना से 20,000 किलोवाट बिजली पैदा की जाती है। इसकी आधी बिजली नेपाल देश को और बाकी बिहार राज्य में खपत होती है।

तुंगभद्रा परियोजना- आंध्रप्रदेश स्थित दक्षिणी भारत की यह सबसे बड़ी परियोजना है जो कृष्णा की सहायक नदी तुंगभद्रा पर बनाया गया है। इसकी विद्युत उत्पादन क्षमता एक लाख किलोवाट है। इसका निर्माण कर्नाटक एवं आंध्रप्रदेश राज्य के सहयोग से हुआ है।


36. वन एवं वन्य प्राणियों के महत्त्व का विस्तार से वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ वन एवं वन्य प्राणी न केवल प्राकृतिक संसाधन है, बल्कि पारिस्थितिका तंत्र निर्माण के प्रमुख घटक है। मानव का इससे बडा गहरा संबंध है। वास्तव में वन प्रकति का एक अमूल्य उपहार है। वन और वन्य प्राणी मानव के लिए प्रतिस्थापित होने वाला संसाधन है। जीवमंडल में सभी जीवों को संतुलित स्थिति म जीने के लिए आवश्यक संतलित पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण में वनों का सवाधिक योगदान रहा है।
मानव जीवन की तीन मूल आवश्यकताएँ होती हैं-भोजन, वस्त्र और आवास. इन तीनों आवश्यकताओं की पर्ति के लिए मानव प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से वनों पर ही निर्भर रहता है।
इतना ही नहीं वन जलवायु को भी प्रभावित करता है। वन अपने आसपास क्षेत्रों में वर्षा करवाकर कषि को उन्नत बनाता है। यह बाढ को नियात्रत करता है , यह मिट्टी कटाव को रोकता है, मिट्टी को उर्वर बनाता है। वन्य जीवों का शरणस्थल होता है साथ ही अनेक मानवीय आवश्यकताओं की पति को भी सुलभ बनाता है। इस प्रकार यह कह सकते हैं कि प्रकति का अनपम उपहार वन एवं वन्य जाव मानक के लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण संसाधन है।


37. हिमालय की नदियों से सदा जल मिलता है, पर प्रायद्वीपीय भारत की नदियाँ ऋतु विशेष में ही जलापूरित रहती हैं। क्यों ?

उत्तर ⇒ हिमालय से निकलने वाली नदियों में सदा जल इसलिए मिलता है कि हिमालय का ऊपरी शिखर बर्फ से ढका है। वर्षा जल के अतिरिक्त बफ क पिला से वर्ष भर उन नदियों में जल प्रवाहित होता रहता है। हिमालय से निकलन वाला नदियों का उदगम हिमानी से है इसलिए जल की आपर्ति होती रहती है।
जबकि दूसरी ओर प्रायद्वीपीय पठार में बहने वाली नदियाँ बरसाती है, उसमें केवल वर्षा का जल ही प्रवाहित होता है और भारत में वर्षा कुछ महीने ही होती है, शेष समय नदियाँ सूख जाती है। उसमें जल की आपूर्ति नहीं होती और जल प्रवाहित नहीं होता।


38. बायोगैस ऊर्जा पर टिप्पणी लिखें।

उत्तर ⇒ भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहाँ बड़े पैमाने पर पशुओं को पाला जाता है। उनके गोबर, मल-मूत्र, गन्ना की खोई, धान की भूसी, कृषि के कूड़े-कचड़े, वृक्षों की झाड़ियाँ, घास-फूस से हजारों मेगावाट विद्युत उत्पन्न किया जा सकता है। गोबर गैस संयंत्र लगाकर ग्रामीण क्षेत्रों में गोबर गैस का उत्पादन भी किया जा रहा है। बड़े नगरों में भी बायोगैस संयंत्र लगाकर जरूरत पूरी की जाती है। जैसे दिल्ली नगर के ओखला में इस प्रकार का कार्य किया जा रहा है। इस गैस की तापीय क्षमता मिट्टी के तेल, उपला और लकड़ी के कोयले की तापीय क्षमता से अधिक होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में बायोगैस का उपयोग खाना पकाने, घरों में रोशनी करने एवं सिंचाई करने में किया जाता है, शहरी क्षेत्रों में भी सडकों की रोशनी के लिए बायोगैस का प्रयोग किया जा रहा है।


39: शुष्क प्रदेशों में वर्षा जल का भंडारण किस प्रकार किया जाता है ? यह किस प्रकार उपयोगी है ?

उत्तर ⇒ धरातल पर उपयोगी जल की कमी और भूमिगत जल के स्तर में लगातार गिरावट होने के कारण वर्षा जल की महत्ता बढ़ जाती है। देश भर में वा जल का वितरण भी असामान्य है। इसलिए शुष्क प्रदेशों में जहाँ वर्षा कम होती है। वर्षा के जल संग्रह कर उपयोग में लाना और भी आवश्यक हो जाता है।
भारतवर्ष में प्राचीन काल से ही वर्षा जल के संग्रह एवं उपयोग का प्रचलन रहा है। परंत स्थानीय स्तर पर जल के संग्रह के तौर तरीके भिन्न-भिन्न हैं। भारत के पश्चिम भाग में खासकर राजस्थान में पेयजल हेतु वर्षा जल का संग्रह छतों पर किया जाता है। शुष्क एवं अद्धशुष्क प्रदेशों में वर्षा जल को गदों में जाता है जिसस सिचाइ का जा सका राजस्थान के बाडमेर और पयजल का सग्रह भामगत-टक म किया जाता है जिसे टाँका कला आगन म हआ करता हा जिस छत पर सनाहत जल को पाप जाता है। मेघालय के शिलांग में छत पर वर्षा जल के संग्रह की प्रथा आज भी प्रचलित है।
वर्तमान समय में महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, राजस्थान एवं गुजरात सहित कई राज्यों में वर्षाजल संग्रह एवं पुनः चक्रण किया जा रहा है।


40 भारत की चार प्रमख नदी घाटी परियोजनाओं का वर्णन करे।

उत्तर ⇒ भारत में एक साथ कई उद्देश्यों की पूर्ति के लिए कई नदी पार परियोजनाएँ बनाई गई है। इनमें चार मुख्य नदी घाटी परियोजना निम्नलिखित है-

(i) दामोदर नदी घाटी परियोजना- पहले दामोदर नदी विनाश लाने वाली ‘शोक नदी’ के रूप में जानी जाती थी। ये छोटानागपुर (झारखंड निकलकर पश्चिम बंगाल में हुगली नदी तक जाती है। इसके निकट कोयला और लौह-अयस्क का भंडार पाया जाता है। इस परियोजना से दामोदर और उसकी सहायक नदियों पर बाँध बनाये गये जिससे बाढ़ पर नियंत्रण किया गया, जल वित का उत्पादन किया जाने लगा, सिंचाई के लिए नहरें बनायी गई। जल विद्यत ” से छोटानागपुर और पश्चिम बंगाल के उद्योगों का भरपूर विकास हुआ।

(ii)भाखड़ा नांगल परियोजना- यह सतलज नदी पर दुनिया का सबसे ऊँचा बाँध बनाया गया है। यह भारत की सबसे बड़ी परियोजना है। इस परियोजना से 18 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की जाती है। इससे कृषि और उद्योग में क्रांति आयी है। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तराखंड, राजस्थान राज्य मुख्य रूप से लाभांवित है।

(iii) हीराकण्ड परियोजना- उड़ीसा राज्य के महानदी पर ससार का सबसे लंबा बाँध बनाया गया है। इससे सिंचाई और बिजली उत्पादन कर कृषि एवं उद्योग
को विकास किया गया है।

(iv) कोसी परियोजना- यह उत्तर बिहार की कोसी नदी पर बनायी गयी परियोजना है। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई, भूमि संरक्षण, जल विद्युत उत्पादन करना है। इस परियोजना से बिहार राज्य और नेपाल देश को लाभ मिला है।


41. जल किस प्रकार एक दुर्लभ संसाधन है ?

उत्तर ⇒ पृथ्वी को जल ग्रह कहा जाता है। परंतु 96.5% जल सात महासागरों में पाया जाता है, जो यातायात को छोड़कर उपयोगी नहीं है। यह हमारी बुनियादी जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता क्योंकि यह खारा जल है। धरती पर पाये जाने वाले जल में मात्र 2.5% भाग ही उपयोगी है। इसमें भी 70% भाग बर्फ के रूप में । ग्रीनलैंड, अंटार्कटिका महादेश तथा हिमालय के शिखरों एवं हिसदों में पाये जाते हैं शेष 30% जल ही नदी, तालाबों, भूमिगत जल के रूप में पाया जाता है। वर्षा का जल मीठा जल है। विश्व की कुल वर्षा का 4% जल ही भारत में उपलब्ध होता है। भारत में अधिक जनसंख्या के कारण प्रतिव्यक्ति प्रतिवर्ष जल उपलब्धता की दृष्टि । से भारत का विश्व में 133 वाँ स्थान है। एक अंदाजे के मुताबिक 2025 ई० तक विश्व के अनेक देशों में जल का अभाव होने लगेगा। भारत को भी इस संकट का सामना करना पड़ेगा। इस प्रकार यह कह सकते हैं कि जल एक दुर्लभ संसाधन है।


42. बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजना क्या है? इसके लाभ/ हानि को बताएँ।

उत्तर ⇒ नदी संबंधी ऐसी योजना बनाया जाना जो एक साथ कई उद्देश्यों की पूर्ति करता हो नदी घाटी बहुउद्देशीय परियोजना कहा जाता है। इस परियोजना से निम्न प्रकार के लाभ होते हैं

लाभ- 

(i) नदियों पर बाँध (बराज) बनाकर नहरें निकाली जाती है जिससे वर्षाभाव के क्षेत्र में सिंचाई की जाती है।
(ii) जल विद्युत उत्पन्न किया जाता है।
(iii) बाढ़ की रोकथाम करना, मिट्टी के कटाव को रोकना।
(iv) मछलीपालन, यातायात की सुविधा प्राप्त करना।
(v) पर्यटकों के लिए आकर्षण केंद्र बनाना आदि।

इस प्रकार के परियोजना के कुछ दुष्परिणाम भी देखे गये हैं जो निम्न है।

हानि- 

(i) नदियों पर बाँध बनाने से स्वाभाविक प्रवाह अवरुद्ध हो जाता है। नदी की तली में कचड़े जमा हो जाता है और प्रत्येक वर्ष बाद का इस बनता रहता है।
(ii) जल प्रदूषण की संभावना बढ़ जाती है इसका दष्प्रभाव जलीय जावा पड़ता है।
(iii) इस प्रकार की परियोजना से बड़े पैमाने पर विस्थापन की समस्या उत्पन्न हो जाती है।
(iv) नहरों से अधिक सिंचाई करने पर भमि की उर्वरता घटने लगती है।


43. बढ़ती जनसंख्या, औद्योगिकीकरण तथा शहरीकरण के कारण जल-दुर्लभता कैसे होती है ? व्याख्या करें।

उत्तर ⇒ (i) बढ़ती जनसंख्या- बढ़ती जनसंख्या जल दुर्लभता के उत्तरदायी एक प्रमुख कारक है। बढ़ती जनसंख्या के कारण ही अधिकतर शहरों का का सामना करना पड़ रहा है। अधिक जनसंख्या के लिए जल घरेलू उपयोग में नहीं बल्कि अधिक अनाज उगाने के लिए भी चाहिए।

(ii) कृषि का व्यवसायीकरण- हरित क्रांति की सफलता के बाद हमारे किसान वाणिज्यिक फसलों का उत्पादन कर रहे हैं। वाणिज्यिक फसलों के लिए अधिक जल तथा निवेश की आवश्यकता होती है। नलकूल तथा कुओं जैसे मनिश्चित सिंचाई के साधन भौम जलस्तर के नीचे गिरने के लिए उत्तरदायी हैं।

(iii) औद्योगिकीकरण- स्वतंत्रता के बाद भारत में तेजी से औद्योगिकीकरण और शहरीकरण हुआ। आजकल हर जगह बहुराष्ट्रीय कंपनियों बड़े औद्योगिक घरानों के रूप में फैली हुई हैं। उद्योगों की बढ़ती हुई संख्या के कारण अलवणीय जल संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है। उद्योगों को अत्यधिक जल के अलावा उनकी जलाने के लिए ऊर्जा की भी आवश्यकता होती है और इसकी पूर्ति जल विद्युत से होती है।

(iv) शहरीकरण- शहरीकरण ने भी जल दुर्लभता की समस्या में बढ़ोतरी की है। हमारे अधिकांश शहरों में जनसंख्या की अधिकता है। अधिक जनसंख्या जल संसाधनों का अति उपयोग कर रही है तथा उपलब्ध संसाधनों को प्रदूषित कर रही है।


44. भारत में पारंपरिक शक्ति के विभिन्न स्रोतों का विवरण प्रस्तुत करें।

उत्तर ⇒ भारत में पारंपरिक शक्ति के विभिन्न स्रोत निम्न प्रकार हैं –

(i) कोयला– यह ऊर्जा का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है। 2008 तक भारत में कोयला का अनुमानित भंडार 26,454.करोड़ टन का अंदाजा था और कुल उत्पादन 456.37 मिलियन टन हुआ था। यहाँ दो समूहों के कोयले का निक्षेप पाया जाता है जिसमें 96% कोयला गोंडवाना समूह का है जिसका विस्तार झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल राज्यों में पाया जाता है। दूसरे प्रकार के कोयला में टर्शियरी युगीन कोयला आता है। यह नया और घटिया किस्म का कोयला है जो असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय और नागालैंड में मिलता है।

(ii) पेट्रोलियम- यह सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी शक्ति का साधन है। यह अनेक उद्योगों का कच्चा माल भी है। यह गैसोलीन, डीजल, किरासन तेल. रंग-रोगन, कृत्रिम रेशा, प्लास्टिक, साबुन आदि के निर्माण में काम आता है।
भारत में पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस का भंडार 17 अरब टन है। यहाँ विश्व के कुल उत्पादन का मात्र 1% उत्पादन होता है, जो देश में खपत से बहुत कम है।

भारत में पाँच तेल उत्पादक क्षेत्र हैं। उत्तरी पूर्वी प्रदेश में असम घाटी, अरुणाचल प्रदेश के क्षेत्र आते हैं। गुजरात क्षेत्र में खंभात की खाड़ी एवं मैदानी भाग आता है। मंबई हाई क्षेत्र, पर्वी तटीय प्रदेश में, कृष्णा, गोदावरी और कावेरी की घाटियों में पाया जाता है, बाड़मेरी बेसीन से भी तेल प्राप्त किया जा रहा है।

(iii) प्राकृतिक गैस- एक अनुमान के अनुसार भारत में 700 अरब घनमीटर प्राकृतिक गैस का भंडार संचित है। 2004-05 में इसका उत्पादन 3082 करोड़ घन’ मीटर हुआ था। इसके अतिरिक्त जल विद्युत, ताप शीक्त और परमाणु शक्ति के रूप में भी पारंपरिक ऊर्जा के साधन भारत में पाये जाते हैं।


45. जल संरक्षण से क्या समझते हैं? इसके क्या उपाय हैं ?

उत्तर ⇒ मानव को प्रकृति से अनेक उपहार मिले हैं जिससे मानवीय जीवन की आवश्यकताएं पूरी होती हैं, इसलिए इनका संरक्षण आवश्यक है। इन संसाधनों में जल एक ऐसा संसाधन है जिसका फैलाव पृथ्वी के दो-तिहाई भाग पर पाया जाता है। परंतु उपयोगी जल बहुत कम है। इसलिए इसके उचित प्रबंधन एवं संरक्षण की आवश्यकता है, ताकि जल संकट दूर हो सके। जल संरक्षण के लिए सरकारी स्तर पर लगातार प्रयास जारी है। भारत सरकार ने 1987 ई० में राष्ट्रीय जल नीति बनायी थी जिसे 2002 में पुनः संशोधित कर लागू किया गया।
जल संरक्षण के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं-

(i) भूमिगत जल की पुन: पूर्ति – भूमिगतजल के स्तर में लगातार हो रहे गिरावट को नियंत्रित करने के लिए वृक्षारोपन, जैविक व कंपोस्ट का उपयोग, वेटलैंडस का संरक्षण, वर्षा जल का संचयन जैसे कार्यक्रम को चलाना उपयोगी सिद्ध होगा।
 

(ii) जल संभर प्रबंधन- जल प्रवाह या जल जमाव का उपयोग कर उद्यान, कृषि वानिकी, जल कृषि, कृषि उत्पादन को बढ़ावा दिया जा सकता है इससे पेयजल की आपूर्ति भी की जा सकती है।

(iii) तकनीकी विकास- तकनीकी के माध्यम से जल को कम-से-कम उपयोग कर अधिकाधिक लाभ लेकर भी जल संरक्षण किया जा सकता है। ड्रिप सिंचाई-लिफ्टसिंचाई, सूक्ष्म फुहारों द्वारा सिंचाई, सीढ़ीनुमा खेती से जल का संरक्षण किया जा सकता है।


46. सतत पोषणीय विकास क्या है? लिखें।

उत्तर ⇒ सतत पोषणीय विकास एक ऐसा विकास है जिसमें भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकता की पूर्ति को ध्यान में रखते हए वर्तमान पीढी अपनी आवश्यकता पूरी करे ऐसा न हो कि आर्थिक विकास की लालसा में प्राकृतिक संसाधनों का अँधाधुंध दोहन किया जाय। अधिक-से-अधिक उत्पादन के लिए कोयला, पेट्रोलियम कोअधिक-से-अधिक निकाला जाय और भविष्य के लिए कुछ बचे ही नहीं।इस संबंध में भारत और विशेष कर बिहार के संदर्भ में सतत पोषणीय विकास के अंतर्गत निम्न सुझाव समय के अनुकूल है –

(i) नहरी क्षेत्रों में अधिक सिंचाई पर बल नहीं दिया जाना चाहिए इससे पानी की बर्बादी और भूमि की उर्वरता घट जाती है।
(ii) कम वर्षा वाले क्षेत्रों में चना, बाजरा, मूंग की खेती करनी चाहिए। असमतल भमि को समतल बनाकर खेती करनी चाहिए। इसमें जल की आवश्यकता कम होती है।
(iii) सिंचाई के लिए नई तकनीक को अपनाया जाना चाहिए।
(iv) खनिज संपदा एवं खनिज तेल निकालने में आधुनिक उपक्रम एवं नई तकनीक प्रयोग में लाना चाहिए ताकि निकालने के क्रम में कम-से-कम , बर्बादी हो।
(v) वृक्षारोपण को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।


47. भारत में अत्यधिक पशुधन होने के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था में इसका योगदान लगभग नगण्य है। स्पष्ट करें।

उत्तर ⇒ पशुपालन के मामले में भारत को विश्व में अग्रणी माना जाता है। परंतु इतने पशुधन के बावजूद अर्थव्यवस्था में इसका योगदान लगभग नगण्य है। इसके निम्न कारण हैं भारत में स्थायी चरागाह की बहुत कमी है। मात्र 4% भूमि पर चरागाह बचा है। वह भी धीरे-धीरे खेती में बदलता जा रहा है। इससे पशुपालन पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। पशुओं के लिए चारा की समस्या हमेशा बनी रहती है। भारत के जिन भागों में पशुओं की संख्या अधिक मिलती है वह क्षेत्र प्राकृतिक आपदा से प्रभावित रहता है। इससे पशुओं का चारा उपलब्ध होने में कठिनाई होती है। चारे की कमी का सीधा प्रभाव दुग्ध उत्पादन पर पड़ता है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था में पशुधन का योगदान बहुत कम हो पाता है।
भारत में पशओं के उत्तम नस्ल और उन्हें पालने के वैज्ञानिक तरीके का भी अभाव देखने को मिलता है। हालाँकि इस दिशा में सरकारी स्तर पर कई प्रयास किए गये हैं, कुछ सफलता मिली है। परंतु जितना इस दिशा में कार्य करना चाहिए उतना नहीं हो पाया है।
अतएव उत्तम नस्ल के पशुओं का अभाव, चारा का अभाव, बीमार पड़ने पर इलाज का अभाव, रख रखाव आदि में कमी, पशुपालन की वैज्ञानिक तकनीक की कमी के कारण दुग्ध उत्पादन कम हो पाता है और पशुधन अधिक होने पर भी इसका भारतीय अर्थव्यवस्था में योगदान नगण्य है।


48. भारत में जनसंख्या वृद्धि से किस प्रकार भूमि का ह्रास हो रहा है ? उन्हें रोकने के लिए सहयाद लें।

उत्तर ⇒ भारत का जनसख्याम लगातार वाद्ध स प्रातव्यक्ति भमि कम पानी जा रही है। कल-कारखानों के बढ़ने तथा नगरों के विकास से भी भूमि का ह्रास हआ है। वन क्षेत्र घटता जा रहा है। चरागाह भी समाप्त होते जा रहे हैं। का फैलाव बढ़ता जा रहा है। इसलिए भूमि के हास को रोकना जरूरी हो गया है।
अधिक सिंचाई से भी समस्या उत्पन्न हो रही है। जल जमाव के कारण निचली भमि बेकार हो जाती है। गुजरात में नमक के प्रभाव से ऊँची भूमि खेती के लायक नहीं रह गयी है। हिमाचल प्रदेश बर्फ के जमाव के कारण राज्य का चौथाई भाग खेती के योग नहीं है। भूमि के कटाव से भी भूमि-क्षेत्र घटता जा रहा है। पहाड़ी ढालों पर वर्षा जल से, शुष्क क्षेत्रों में वायु अपरदन से भी भूमि का ह्रास होता जा रहा है।

भूमि-हास को रोकने के लिए निम्नांकित सुझाव दिए जाते हैं –

(i) उपजाऊ भूमि को गैर कृषि कार्य में न उपयोग किया जाए।
(ii) जनसंख्या वृद्धि दर में कमी लायी जाए।
(iii) पहाड़ी भागों में सीढ़ीनुमा खेत बनाकर और वृक्षारोपन करके भूमि क्षरण को रोका जाय।
(iv) मरुस्थल की सीमावर्ती क्षेत्र में झाड़ियाँ लगाकर मरुभूमि के प्रसार को रोका जाए।
(v) कारखानों के आसपास औद्योगिक कचरों को फैलाने से रोका जाए।
(vi) देश में उद्योग का विकास किया जाए इससे कृषि भूमि पर पड़ रहे बोझ को कम किया जा सकता है।
(vii) प्राकृतिक आपदा से देश की रक्षा की जाए।
(viii) वायु अपरदन को रोकने के लिए पशुचारण पर रोक लगाना चाहिए।


49. भारत की जल विद्यत परियोजनाओं का विवरण प्रस्तुत करें।

उत्तर ⇒ सर्वप्रथम दक्षिण भारत में कोयला और खनिज तेल के अभाव में कर्नाटक के शिवसमुद्रम में जल शक्ति गृह स्थापित किया गया। इसके बाद बंबई, पूणे क्षेत्र में टाटा जल विद्युत परियोजना बनी। इसके बाद दक्षिण भारत में पायकारा योजना बनी जिससे कोयंबटूर, तिरूचिरापल्ली, मदुरै आदि नगरों को जल बिधुत की आपूर्ति की गयी।
हिमालय क्षेत्र में प्रथम जल विद्युत केन्द्र मंडी है। इसके बाद गंगा नहर की जिला विद्युत-ग्रिड स्थापित की गई। इसके बाद भाखड़ा नांगल योजना बनी। आज देशभर में 80 जल विद्युत केंद्र स्थापित हैं। इनमें अधिक केंद्र बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजना के अंतर्गत आते हैं जैसे महाराष्ट्र में टाटा जलविद्युत तथा कोयना-काकरापाड़ा परियोजनाएँ, कर्नाटक में शिवसमुद्रम, शिमोगा, शरावती एवं भद्रा परियोजनाएँ, केरल में पल्लीवासल आदि, तमिलनाडु में पापनशम आदि, आंध्रप्रदेश में तुंगभद्रा, नागार्जुन आदि, उड़ीसा में हीराकुण्ड, बिहार में कोसी, गंडक, झारखंड में दामोदर, पश्चिमी बंगाल में मयूराक्षी, उत्तर प्रदेश में गंगा-ग्रिड, शारदा रिहंद, हिमाचल प्रदेश में मंडी, भाखड़ा-नांगल, कश्मीर में बारामुला, निम्न झेलम आदि परियोजनाएँ हैं।
उत्तराखंड में टिहरी बाँध परियोजना और मध्यप्रदेश में नर्मदा घाटी परियोजनाएँ भी बनायी गई है जो विवाद के घेरे में हैं। आशा है विवाद खत्म होगी और परियोजनाएँ काम करने लगेगी।


Geography ( भूगोल )  दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

1 भारत : संसाधन एवं उपयोग
2 कृषि ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )
3 निर्माण उद्योग ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )
4 परिवहन, संचार एवं व्यापार
5 बिहार : कृषि एवं वन संसाधन
6 मानचित्र अध्ययन ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )

History ( इतिहास ) दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

1 यूरोप में राष्ट्रवाद
2 समाजवाद एवं साम्यवाद
3 हिंद-चीन में राष्ट्रवादी आंदोलन
4 भारत में राष्ट्रवाद
5 अर्थव्यवस्था और आजीविका
6 शहरीकरण एवं शहरी जीवन
7 व्यापार और भूमंडलीकरण
8 प्रेस-संस्कृति एवं राष्ट्रवाद

Political Science दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

1 लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी
2 सत्ता में साझेदारी की कार्यप्रणाली
3 लोकतंत्र में प्रतिस्पर्धा एवं संघर्ष
4 लोकतंत्र की उपलब्धियाँ
5 लोकतंत्र की चुनौतियाँ

Economics ( अर्थशास्त्र ) दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

1 अर्थव्यवस्था एवं इसके विकास का इतिहास
2 राज्य एवं राष्ट्र की आय
3 मुद्रा, बचत एवं साख
4 हमारी वित्तीय संस्थाएँ
5 रोजगार एवं सेवाएँ
6 वैश्वीकरण ( लघु उत्तरीय प्रश्न )
7 उपभोक्ता जागरण एवं संरक्षण
Bihar Board ( BSEB ) PDF
You might also like